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Wednesday, 30 December 2015

प्रतीक्षा


(1)
तुमसे छूट जाने के बाद 
कितना कुछ छूटता गया मुझसे, 
मेरी मुस्कान, 
मेरी कहानियाँ, 
मेरी कवितायेँ, 
जैसे कि तुम्हारा छूट जाना,
शब्दों का छूट जाना था,
जिन्दगी का छूट जाना था ...


(2) 
ढलती शाम के साथ सूरज 
समेट ले जाता है, 
मेरी आस का उजाला, 
उम्मीदों के रँग, 
खिलखिलाती हँसी, 
दिन भर की ख़ुशी,
छोड़ जाता है 'मुझमे'
'तन्हाई',
'उदासी',
'और'
प्रतीक्षा का
'एक और दिन' !!अनुश्री!!

Monday, 28 December 2015

लड़की पगली


जिसका जीवन दुखों में बीता, वो सुख की बदली क्या जाने,
पग पग जिसको काँटे मिले हों, फूलों की हस्ती क्या जाने,

पीकर जिसको अब तक जिन्दा हैं, वो जीवन घट रीत रहा,
पाला था जिसको नाजों से, वो पल छिन अब बीत रहा
मौत तो हर पल खेल है रचती, चाल है अब अगली क्या जाने,

उम्मीदें वो लिखे भी कैसे, जब आस का न एहसास रहा,
उजियारे को वो क्या जाने, अँधियारा ही साथ रहा,
क्या होता है हँसना - गाना , वो लड़की पगली क्या जाने,

सुख -दुःख जीवन के दो पहलू, बारी बारी बदलेंगे,
आज निराशा है जीवन में, कल खुशियों के दीप जलेंगे,
जिसने पल पल ग़मों को भोगा, वो अगली पिछली क्या जाने,

जिसका जीवन दुखों में बीता, वो सुख की बदली क्या जाने,
पग पग जिसको काँटे मिले हों, फूलों की हस्ती क्या जाने, !!अनुश्री!!

Friday, 25 September 2015

यादें,

प्रेम मेरे,
यादें, 
अँखियों में 
डेरा जमा कर बैठ गयीं हैं, 
मन ने जाना, 
तुम धड़कते हो अब भी, 
दिल की जगह, 
कई बार लिखना चाहा, 
'भूलना' 
लेकिन जाने कैसे, 
हर बार लिखती रही 
'याद' ... !!अनुश्री!!

Wednesday, 16 September 2015

'प्रेम'

'प्रेम' मेरे
तुम जानते हो ना,
तुमसे इतर कुछ भी
नहीं गढ़ा मैंने,
न जिन्दगी, न सपने,
न खुशियाँ,
'तुम'
यानी जीवन संगीत,
मन के मयूर का नृत्य,
तुम खिलखिलाती हंसी,
चहकती ख़ुशी,
महकता आँगन,
बरसता सावन,
फागुन के रंग,
जीने की उमंग,
मेहंदी की खुशबू,
जादूगर का जादू,
जीवन का आभास,
'प्रेम' तुम साँस !!अनुश्री!!

Monday, 14 September 2015

'विदा'

तुमसे कहा था न,
जिस रोज़ जान जाऊँगी
तुम्हारा 'सच'
कोई सवाल नहीं करुँगी,
कोई जवाब नहीं माँगूंगी,
'बस'
दूर क्षितिज पर लिख दूंगी, 
'विदा'
और खो जाऊँगी
आसमान में यहीं-कहीं !!अनुश्री!!

Tuesday, 25 August 2015

कविता तुम जननी, तुम माँ !!

आसान नही था
उम्र के इस मोड़ पर
कविता लिखने की
शुरुआत करना,
कहाँ कविता की शैशवस्था
और कहाँ उम्र की प्रौढ़ावस्था,
लाज़िमी था, मजाक उड़ने का,
नकार दिए जाने का डर,
कविता ने पढ़ा मुझे,
उसने कहा,
मत लिखो मुझे, 'बस'
टूट जाने दो मन का बाँध,
बह जाने दो भाव की धारा,
उन्हें पहनाती जाओ,
शब्दों की पैरहन,
और यूँ ही बनती गयी कविता,
सच कविता,
तुममें उतर कर मेरे शब्द
बंजारे नहीं रह जाते,
उन्हें ठिकाना मिल जाता है,
वे बच जाते हैं उदण्ड होने से,
नहीं फूटते कहीं भी किसी पर भी,
'कविता' तुम मन के सारे
वेग सहकर समेट लेती हो धारा,
तृप्त कर देती हो आत्मा,
हर लेखन के बाद प्रदान करती हो,
एक नया 'मन', नया 'जीवन' ,
कविता तुम जननी, तुम माँ !!

कविता

कविता कहती है,
मत बाँधो मुझे,
शब्दों के गहन जाल में,
मुक्त रखो,
घृणा से,
तुम अपना क्रोध,
अपनी नफरत थोपना,
बंद करो मुझपे,
लिखना ही है,
तो युवा मन का जोश लिखो,
धधकता आक्रोश लिखो,
कि 'जलन' जला देगी,
तुम्हारा ही 'मैं' !!अनुश्री!!

Friday, 21 August 2015

'कैक्टस'

उन दिनों
जब हारने लगा था
'मन',
टूटने लगी थी 'आस',
'वो' मन की जमीन पर
खुरच - खुरच कर
लिखने लगी थी 'जीत'।
आस के अनेकानेक दिये
जोड़ कर उसने उम्मीद का
एक नया सूरज
तैयार कर लिया।
तपते रेगिस्तान के बीच
प्यास से जल कर
मर जाने की बजाय उसने
तय कर लिया
'कैक्टस' हो जाना !!अनुश्री!!

Thursday, 6 August 2015

तटस्थ रहता है 'प्रेम'

हृदय सुनता नहीं है,
समझता भी नहीं है कि
नेह के बन्धन
सोच - समझकर बाँधे जाने चाहिए,
अपनी तरफ के सिरे को
हाथ में थामे
सपनो में खोया मन,
 अचानक छूट गए
दूसरे सिरे के झटके से
चीत्कार उठता है,
उफ़! वो उठे हुए
हाथ का उठा रह जाना,
आवाज़ देते कण्ठ का
अवरुद्ध हो जाना,
टूट जाना चाहता है,
मन का बाँध ,
बिखर जाने की इच्छा लिए,
बही हुई भावनाओं के
बावजूद भी, कहीं गहरे,
तटस्थ रहता है
'प्रेम'
किसी के जिन्दगी से
निकल जाने के बाद या
निकाल दिए जाने के बाद भी !!अनुश्री!!

Tuesday, 28 July 2015

चुटकी भर याद

कितना कुछ
बह गया इन दिनों
तुम्हारे 'हिस्से' का,
सारा 'प्रेम',
सारी 'चाहत',
सारी 'संवेदना',
बहा दिया, 'तुम्हें भी',
पूरा का पूरा,



चुटकी भर याद तक
नहीं रखी,
रह गया बस,
खाली 'मन',
खाली 'जीवन' !!अनुश्री!!

Sunday, 19 July 2015

तुम्हारा 'अक्स

हाँ, यही,
यही तो है,
जो सोचती हूँ मैं  भी,
कहीं कोई नहीं मेरा,
कहीं किसी की नहीं हूँ मैं
रत्ती भर भी नहीं,
व्यर्थ है तलाशना,
वक़्त को बाँधना,
बदल दी है सोच,
खोल दी मुट्ठी,
जिस्मों के रिश्ते
उम्र ले कर आते होंगे,
'मन' नहीं आता,
'परिधि' में बंध कर,
और चाँद तो हमेशा से मेरा है,
मेरे साथ, मेरे पास,
तुम्हारा 'अक्स',
तुम्हें 'खो' देने का एहसास
नहीं होता अब,
कि 'तुम' धड़कन हो,
रूह  हो,
हमेशा ही,
मेरे संग संग   !!अनुश्री!!

Wednesday, 15 July 2015

कविता आँगन से

बहुत मुश्किल होता है
खुद को मसरूफ दिखाना,
ये जताना
कि जाओ
तुम्हें नहीं तो मुझे भी नहीं है
तुम्हारी परवाह,
खारिज करती हूँ
तुम्हारा यादों में होना,
मुश्किल होता है,
बुहारे हुए घर को
फिर बुहारना,
धुले बर्तन ढूंढ - ढूंढ कर
दुबारा धुलना,
याद कर - कर के
काम निकालना,
कि निकल सको 'तुम'
जेहन से बाहर,
हाँ, सच में,
बहुत मुश्किल होता है,
आइना देखते वक़्त
खुद से ही नजरें चुराना,
कहीं नजरों ने नजरों  की
चोरी पकड़ ली, तो?
'तुम' भी न, अजब हो,
जाने कैसे पैठ बना लेते हो,
बंद दरवाजे भीतर भी !!अनुश्री!! 

Thursday, 9 July 2015

अधूरापन



अग्नि के समक्ष
हाथ थामते वक़्त
थाम लिया था हमने,
एक - दूसरे का
अधूरापन,
पूर्ण हो गयी थी 'मैं',
पूर्ण हो गए थे 'तुम' भी,
तुममें उतर कर, 
लौटंना 
मुमकिन ही नहीं रहा  कभी!!अनुश्री!!







Tuesday, 7 July 2015

जाविदां

मेरी यादों की बारिश में
भींगते वक़्त,
तुम्हारा सिन्दूर हुआ मन,
भिगो देता है मेरा 'अंतर्मन',
करवाचौथ का वो चाँद,
आजकल मेरे आस-पास ही है,
लेकिन आज पहले
'तुम' हो, फिर 'वो' ,
इक 'काश' लिए
निहारती हूँ तुम्हें,
वक़्त - बेवक़्त।
तकिये के गिलाफ़ में
सहेज रखा है 'प्रेम' कि
जी सकूँ तुममे सिमट कर,
'सुनो',
मैं जुदा नहीं, जाविदां हूँ ......


इश्क़ में मेरी चुनर रंग दे, पगली हो जाऊँ,
या मीरा सी फितरत कर दे, कमली हो जाऊँ !!अनुश्री!!

Monday, 29 June 2015

'मृगतृष्णा'

जाने कितने ही नक्षत्रों, 
आकाशगंगाओं को लाँघ कर, 
लौट आता है 'मन'
'तुम' तक, बार- बार,  
ये जानते हुए कि 
तुम्हारी आस, 
इक प्यास है, 
चिरस्थायी प्यास, 
आह! जीवन है, 
तुम्हारे और मेरे प्रेम की 
'मृगतृष्णा', 
हाँ, जादूगर हो 
'स्वामी' 'तुम' !!अनुश्री!!

Friday, 26 June 2015

बलात्कार

बालात्कार  से पीड़ित लड़कियाँ,
बचाये रखना चाहती हैं
अपनी जिजीविषा,
फूँक देना चाहती हैं,
स्याह  अतीत,
मन की पीड़ा,
कौमार्य की टूटन,
तार हुए दामन का
एक - एक टुकड़ा।
छटपटाती हैं कि निकल जायें
जिस्म के लिजलीजेपन  से बाहर,
धुल लेना चाहती हैं 'मन'
कई - कई बार नहा कर।
जाने कितनी ही बार सिलती हैं
'मन',
परन्तु अखबार की  एक खबर
 'बलात्कार',
उधेड़ कर  रख देती है सारी सीलन।
रिसने लगता है रक्त।
पागलों की तरह नोचती हैं
अपना ही जिस्म,
एक - एक छुवन
नोच फेंक देना चाहती हों जैसे।
वक़्त के चाँटे
सूखने नहीं देते आँसू,
उगने नहीं देते मुस्कान।
जिस्म का जख्म
एक - एक कर भर भी जाये तो क्या,
 कैक्टस की तरह फैलते हैं
'मन' के जख्म।
वक़्त और समाज इन्हें भरने नहीं देता,
बल्कि खुरच - खुरच कर
बना देता है 'नासूर' !!अनुश्री!! 

Wednesday, 24 June 2015

न मिलन , न बिछोह

मेरे 'तुम' 
तमाम प्रयासों के बाद भी 
नहीं मार पायी 
हृदय में जन्मा प्रेम, 
खींच निकालना चाहा बाहर, 
कुचलना चाहा 
'मैं' तले,  
'असफल' रही, 
स्वीकारती हूँ, 
नियति ने रच रखा है हमें 
पृथक संसार के लिए, 
'सच', 
कुछ भी तय नहीं होता, 
न मिलन , न बिछोह। 
हम फिर - फिर मिलेंगे, 
फिर - फिर बिछड़ेंगे, 
अनेक बिम्बों में ढलते हुए, 
यह  क्रम, चलता रहेगा, 
अनन्तकाल तक !!अनुश्री!!  

Friday, 19 June 2015

'रंगरेज'

भोर की उनींदी आँखों में 
उपजा एक ख्याल, 
प्रेम 'रंगरेज' भी तो है, 
रंग देता है, 'मन', 
'सपने', 'जीवन' 
और हाँ 'ख्याल' भी, 
तुम्हें याद है न, 
हमारा अनायास मिल जाना, 
पता नहीं कब 
वक़्त ने जड़ दिया था 
वो रंगीन पन्ना 
हमारे जीवन में, 
वो 'एक दिन' 
हमारे पुरे जीवन का 'सार', 
जाते वक़्त तुमने कहा, 
'मौसम' 
फिर लौट कर आने के लिए जाते हैं, 
लेकिन हर बार 
मौसम के साथ 
रंगों का आना 
तय तो नहीं होता न, 
जाने, इस मौसम के रंग, 
मुझसे मिले न मिलें, 
मुझपर खिलें न खिलें !!अनुश्री!!

'तुम'

तुम
बढ़ जाना आगे,
अपने सपनों,
अपनी सम्पूर्णता की तलाश में,
वो
तुम्हारे प्रेम में,
अपने अधूरेपन के
साथ स्थिर हो जाना चाहती है,
उसे नहीं लौटना है पीछे,
और न ही आगे बढ़ने की
तमन्ना है,
'हाँ'
वो गुम जाना चाहती है,
अपने एकाकीपन के साथ,
कि फिर कोई संगीत,
उसे सुनाई न दे ,
उसे नहीं बुनना
कोई खुशियों भरा गीत,
वो काट देना चाहती है रातें,
'चाँद' के साथ,
जो सवाल नहीं करता,
बस 'चुप' सुनता है,
'चुप' कहता है,
उतार लेना चाहती है तुम्हें
आँसुओं की एक- एक बूँद में,
ये जो आसमान ने,
समेट  रखे हैं न,
चाँद, सितारे, अपने बाहुपाश में,
वो भी समेट लेना चाहती है
दिल के किसी कोने में,
'मन'
छुपा लेना चाहती है,
जगह - जगह से उधड़ा हुआ 'मन',
उसे पता है,
उसकी उधड़न रफू करने वाला,
रफ़ूगर नहीं लौटने वाला !!अनुश्री!! 

Tuesday, 16 June 2015

जिन्दगी की रेल

जिन्दगी की रेल
सरपट दौड़ती जा रही है,
वो उचक - उचक कर
खिड़की से निहारती है,
पीछे छूटता बचपन,
घर का आँगन,
यौवन की दहलीज़ का
पहला सावन,
पहले प्यार की खुशबू,
उन दिनों के
मौसम का जादू
जो अक्सर सर चढ़ कर बोलता था।
और भी बहुत कुछ
देखना चाहती थी वो,
अपना आसमान छू
लेने का सपना,
चाँद - सितारों को
मुट्ठी में भर लेने का सपना,
लेकिन रेल की तेज रफ़्तार ने
सब धुंधला कर दिया,
धीरे - धीरे छूट गया सब।
समझने लगी है वो,
ख़ाक हो जाना है उसे
यूँ ही
स्वयं में स्वयं को तलाशते हुए,
जल जाना है
अपनी ही प्यास की आग में
'एक दिन' !!अनुश्री!! 

'रंग'

उसने 
भगवान से कभी भी 
अपने लिए नहीं माँगी, 
रंगीन दुनिया, 
रंगीन सपने, 
रंगीन जिंदगी,
वो खुश है,
अपनी ब्लैक एण्ड व्हाइट
जिन्दगी से,
उसे पता है,
रंगीन दुनिया के रंगीन चेहरे
बहुत जल्दी
'रंग' बदल लेते हैं !!अनुश्री!!



मुझे नहीं चाहिए, 
ढेर सारी खुशियां, 
दुआएं, 
मन्नतों के धागे, 
तुम्हारे सुबह - सुबह 
मुस्कुरा भर देने से ही
खिल जाता है
'मेरा दिन' !!अनुश्री!!

मछुआरे

मछुआरे,
स्वाभाविक है तुम्हारा,
'तुम्हारे' फेंके हुए जाल में,
मछली फंस जाने पर  खुश होना,
कितनी तारीफें बटोरी थी 'तुमने'
इस बहादुरी पर,
'तुम' समझ नहीं पाये
मछुआरे,
हज़ारों मछलियों की भीड़ में से,
सिर्फ उसका फंस जाना,
जरुरी नहीं समझा तुमने कि देख पाते,
उसकी आँखें,
उसकी रफ़्तार,
जो सिर्फ तुम्हारे सानिध्य की खातिर,
स्वयं ही चली आई थी
जाल की तरफ,
काश कि 'तुम' जान पाते,
'वो' प्रेम में थी 'तुमसे' !!अनुश्री!! 

Tuesday, 2 June 2015

'प्रेम' ऐसा भी होता है क्या?

'प्रेम' ऐसा भी होता है क्या?
मिले तो यूँ,
कि जैसे जन्मों से साथ थे,
बिछड़े तो यूँ,
जैसे कि पहचान ही न थी,
तुम्हारा चले जाना,
स्वीकार नहीं होता,
बिना कुछ कहे,
बिना कुछ बताये,
कम से कम मेरा दोष तो बता देते,
बताते तो सही,
कब, कहाँ मैंने आहत किया तुम्हें ?

तुम्हें दोष नहीं दे रही,
कोई शिकायत भी नहीं कर रही,
याद है तुमने कहा था,
"बिलकुल पगलिया हो तुम,
जमाना नहीं समझती" ,
उस वक़्त लगा था,
'तुम'
मजाक कर रहे हो,
लेकिन नहीं,
कितना -कितना सच कहा था तुमने,
सचमुच 'पगलिया' थी मैं,
नहीं समझ पायी 'जमाना'
तुम्हें भी, कहाँ समझ पायी मैं .........

Thursday, 28 May 2015

झील

'प्रेम' 
में होना, 
जैसे झील हो जाना, 
ऊपर से सब शान्त 
और भीतर कोलाहल, 
लेकिन मैं 'प्रेम' में हो कर भी 
झील नहीं बनती
समेट लेती हूँ ,
अपने मन की तमाम
हलचलों को,
ओढ़ लेती हूँ 'चुप' ,
वो 'चुप्पी' मुझमे रच देती है,
इक नयी 'आकाशगंगा',
और मैं उस 'आकाशगंगा' में
गढ़ लेती हूँ इक नया 'संसार',
इस धरातल से परे,
मेरा अपना धरातल,
मेरी अपनी दुनिया,
जहाँ कोई नहीं होता,
सिवा 'मेरे' और
'मेरे अहसास' के !!अनुश्री!!

'चाँद'

'चाँद'
सच बताना,
बूढ़े बरगद के नीचे बैठे,
उस जादुगर से
तुमने भी सीख ली है न
'सम्मोहन विद्या' ,
हर सुबह कसम लेती हूँ,
आज तुम्हें निहारना ही नहीं है,
तुमसे बात ही नहीं करनी,
लेकिन शाम ढलते-ढलते,
स्वयं ही तोड़ देती हूँ कसम,
और तुम्हारे संग मिल कर
'मैं' भी हो जाती हूँ 'तुम'
'चाँद'
तुम ये जादुगरी
छोड़ क्यु नहीं  देते ? !!अनुश्री!!

Thursday, 21 May 2015

तुम्हारे लिए

मैंने जिंदगी में,
सिर्फ दो ही  रंग जाने थे,
'स्याह' और 'सफ़ेद'
तुमने बताया कि जिन्दगी
'इंद्रधनुषी' होती है,
लाल, हरे, नीले, पीले,
कई चटख रंगों से भरपूर,
तुमने बताया कि
'बारिशें',
रंग धुलती नहीं बल्कि
अपने सौंधेपन की खुशबू
से रंग जाती हैं 'मन'
'तुम' वापस ले आये मुझमें,
वो अल्हड सी हँसी,
वो मादकता, वो सपने,
हालाँकि हम हर जगह
एक 'मन' नहीं रहे,
मुझे हर मुलाकात पर
तुम्हारे लिए,
गिफ्ट्स या फूल ले जाना पसन्द था,
मुझे पसन्द था तुम्हारे मुँह से
'आई लव यू' सुनना,
और तुम्हें ये सब फॉर्मल लगता था,
तुम चाहते थे, मैं तुम्हारी
आँखों से समझ जाऊँ 'सब',
हाँ, एक जगह दोनों एक ही जैसे थे,
हम दोनों ही 'चुप्पा' थे,
कम से कम बातों में
अपनी बात कह देने का हुनर रखते थे,
यहाँ तक कि लिखते वक़्त भी,
आधी बात के बाद,
डॉट - डॉट लगा कर छोड़ देना,
हम दोनों, एक ही दर्द जी रहे थे,
दोनों ही जानते थे,
हम समझ लेंगे, एक -दूजे
की अनकही,
जानती हूँ, 'तुम' सपना हो,
मेरा पूरा आकाश,
जो मेरा हो कर भी मेरा नहीं है,
लेकिन इन सब के बावजूद भी,
मैं इसी सपने में, अपनी पूरी जिंदगी,
जीना चाहती हूँ,
और चाहती हूँ, इसी सपने के साथ
विदा हो जाऊँ
'एक दिन' !!अनुश्री!!  

Wednesday, 6 May 2015

उत्सव



'आज' 
प्रथम बार
'प्रेयसी' के गालों ने 
जाना था, 
हर्ष के आँसुओं का 
स्वाद, 
हर्ष के अतिरेक से 
उसके होंठ कँपकपा रहे थे, 
परन्तु, आँखे बोल दे रहीं थी, 
हृदय का सच,  
आह! जैसे कोई वर्षों की 
तपस्या फलीभूत हो गयी हो, 
प्रेयसी का तन - मन 
तरंगित हो रहा था, 
उसके कदम नृत्य 
करने को व्याकुल, 
'प्रेयस' का लौट आना 
किसी 'उत्सव' से कम नहीं था 

उसके लिए !!अनुश्री!! 

Monday, 4 May 2015

'तृप्ता'



इन दिनों,
व्याकुल है, 'प्रेयस'
की 'तृप्ता',
बदहवास सी तलाशती है 'उसे'
क्षितिज के उस पार तक,
आकाशगंगा के विस्तार तक,
स्वयं को घोषित करती है
'अपराधिनी'
'अभिशप्त' वो,
इस विरह वेदना को,
अंगीकार करती है,
सजा के रूप में,
अपने प्रेयस पर कोई
दोषारोपण नहीं करती,
स्वीकारती है,
नियति के लिखे को,
लेकिन 'हाँ',
प्रतीक्षरत रहेंगी 'आँखें,
पल, दिन, साल, सदी तक,
वो जानती है,
'प्रेयस' लौटेगा,
जरूर लौटेगा !!अनुश्री!!

समन्दर 'और' नदी

समन्दर ने कहा,
'नदी, ओ नदी,'
'मुझे प्रेम है तुमसे,
आओ, समाहित हो जाओ मुझमें',
'नदी', जो बरसों से समन्दर के
प्रेम में थी,
इस आमंत्रण से प्रसन्न हो,
पूर्ण वेग से दौड़ पड़ी,
समन्दर के आगोश में समा जाने को,
अपने अन्जाम से 'बेखबर'
समन्दर तो समन्दर ठहरा,
उसमें समा कर
'नदी', नदी रह ही कहाँ जाती है,
समन्दर का हो जाने की चाहत में,
खो देती है,
अपना अस्तित्व,
अपनी पहचान,
'और' समन्दर,
एक नदी को स्वयम में समाहित कर,
तलाशने लगता है
'दूसरी नदी' !!

चाँद

इक रात,
चाँद ने कहा,
'सुनो प्रेयसी'
मैं सौंपना चाहता हूँ तुम्हें,
अपने माथे का दाग,
अपनी कालिमा 'और'
जीना चाहता हूँ
'शफ़्फ़ाफ़'
प्रेयसी जानती थी,
'चाँद' छलिया है,
सुबह के सूरज के साथ ही,
छोड़ जायेगा साथ,
लेकिन 'वो' चाँद के प्रेम में थी,
उसने कुबूल कर लिया,
'चाँद' का नज़राना,
चाँद ने टांक दिया,
अपने माथे का 'दाग'
उसके माथे पर,
'और फिर'
'दोनों' कभी नहीं मिले !!

'तुम्हें'

'तुम्हें' सुनते वक़्त,
'तुमसे' कहते वक़्त
एक और 'मन' होता है,
'मुझमे'
कहता है 'सब'
जो मेरे होंठ नहीं कह पाते,
सुनता है 'सब'
जो 'तुम' नहीं कहते !!

'खत'

'तुम्हारे'
दिल के पते पर,
भेजा है इक 'खत'
जिसमें लिखी है,
'उदासियाँ'
'बेचैनियाँ'
'तुम'
'मैं'
और ये भी
कि
'खत' मिलते ही
'लौट' आना !!

Sunday, 26 April 2015

'गुलमोहर'



'गुलमोहर'
जाने क्यूँ,
'तुम'
बहुत अपने से लगते हो,
'तुम्हारा'
एक मौसम में,
भरपूर प्यार बरसा जाना,
जैसे अमृत घोल देता है नशों में,
जिन्दगी भर देता है मुझमें,

और 'मैं'
बाकी के मौसम,
तुम्हारे प्रेम के नशे में,
'इन्तजार'
में काट देती हूँ !!अनुश्री!!

Thursday, 23 April 2015

तीसरी दुनिया

तीसरा समाज, 
तीसरी दुनिया, तीसरा लिंग,
जाने कितनी ही उपमाओं से 
सज्जित इस तथाकथित समाज से 
उपेक्षित, तिरस्कृत जीवन के 
तमाम झंझवातों से दूर, 
अपनी ही दुनिया में मगन 
एक 'दुनिया'… 
स्त्री होने की अपूर्णता, 
और पुरुष होने की सम्पूर्णता के 
अभाव के साथ जीता 
एक 'मन', 
आँखों में अपने हिस्से की 
जिंदगी का 
मरा हुआ सपना लेकर, 
भरी झोलियों से दुआयें 
बांटने वाली दुनिया, 
अपने लिए नहीं रख पाती, 
'खुशियों के रंग' … 
 भरे पुरे गोद में, 
भर भर कर आशीर्वाद डाल, 
अपनी गोदी का सूनापन ओढ़, 
रातों को सिसकती ये 'दुनिया', 
अपनी वेदना घूँट - घूँट पी कर, 
शहनाइयों की गूँज पर, 
दुल्हन के स्वागत पर, 
बालक के रुदन पर, 
अपने ग़मों के नशे में 
झूमती, नाचती, 
दूसरों की खुशियों में 
खुश होती ये 'दुनिया' … 
रात के अँधेरे में, 
बिलख पड़ती है, 
चीखती है, चिल्लाती है, 
अपनी घुटी हुई आवाज़ में 
आवाज़ लगाती हैं, 
अपने अपनों को ! 
ये चीखें, रात के सन्नाटे से टकरा, 
वापस आ इन्हें ही 
आहत कर जाती हैं, 
और मौत? हुँह!! 
वो भी सुकुन से मरने नहीं देती, 
कंधे नसीब होना तो दूर, 
ये 'दुनिया' , 
पीटी जाती है, जूतों से, चप्पलों से, 
ताकि मुक्त हो, इनका अगला जन्म, 
इस जन्म के शाप से !!
अपनी ही दुनिया में मगन 
एक 'दुनिया'…!!अनुश्री!!

Wednesday, 22 April 2015

'मन'

'इन दिनों'
'मन' उड़ता है,
बादलों के साथ साथ,
लहरों संग अठखेलियां कर,
नंगे पाँव दौड़ पड़ता है, 
रेत पर दूर तक
पहाड़ की चोटी पर
दोनों बाहें पसार,
सिहरती हवा को
अपने भीतर जब्त करने की
नाकाम सी कोशिश,
बेवजह हँसता है,
बेवजह रोता है,
इन दिनों 'मन',
मेरे साथ,
हो कर भी नहीं होता !!अनुश्री!!

Sunday, 19 April 2015

खामोश मोहब्बत

मोहब्बत 
को 
लफ्जों की गरज नहीं होती, 
प्रेम पत्र की 
दरकार नहीं होती, 
एक हल्की सी नजर, 
कह जाती है सैकड़ों अफ़साने, 
'पर' 
नजरों को पढने का हुनर भी 
सबको कहाँ आता है भला ? 
तुम सबसे अनोखे हो, 
पढ़ लेते हो 
मेरी हर अनकही, 
मेरी हर नजर, 
और बुन लेते हो 
कितनी ही कहानियां, 
हमें संग पिरो कर !!अनुश्री!!

Thursday, 16 April 2015

प्यास बाकी रहे

सहज नहीं होता, 
किसी का 
'प्रिय' हो जाना, 
और 
उससे भी 
मुश्किल होता है, 
'प्रेम' को 
सहेज पाना, 
जरुरी है कि 
थोड़ी प्यास बाकी रहे, 
तृप्ति का 
एहसास बाकी रहे, 
'तुम' 
अगले मोड़ मिलोगे, 
ये आस बाकी रहे !!

तिनका - तिनका

कभी तो कहो, 
कभी तो सुनो, 
'मन'
एक रंग होना चाहता है, 
तेरे ही 
'संग संग'
होना चाहता है !!अनुश्री!!



सच! खुश होने के कितने बहाने हैं, 
आपके, सिर्फ आपके ख्वाब सजाने हैं !!अनुश्री!!


उसने अपनी 'मुस्कान' उतार कर, 
उसे  
ये कहते हुए सौंप दिया 
कि 
'इसे अपने पास महफूज़ रखना, 
दुबारा मुलाकात होने पर
ले लूंगी,
तुम्हारे बगैर ये मेरे
किसी काम की भी नहीं !!अनुश्री!!



प्रेम की इस बहती धारा में तुम भी बहो और हम भी बहे 
एक है पीड़ा एक अगन है तुम भी दहो और हम भी दहे !!अनुश्री!!



मुझको तेरी धुन जो लगी तो मन ये मेरा मलंग हो गया, 
तोड़ के सारे रिश्ते नाते, मतवाला तेरे संग हो गया !!अनुश्री!!



फासले में भी आप हमारे
दिल के करीब हैं
ख्वाहिशों की मत पूछिए,
जो मिला नसीब है,

जिंदगी को जिंदगी की चाह हो गयी,
'इश्क़' तू अजीब है !!अनुश्री!!

'फिल इन द ब्लैंक्स'

वो 'लड़की'
उसकी जिंदगी के
'फिल इन द ब्लैंक्स'
का answer थी,
उसने भर दिया था,
लड़के का खालीपन,
'एक दिन'
उस लड़के को लगा
कि उसने,
गलत ऑप्शन fill
कर दिया है,
उसने choose किया,
एक नया ऑप्शन और
'replace'
कर दिया पुराने answer से !!अनुश्री!!
मैं अनजाने ही
शब्द - शब्द ढालती रही
साँचे में
ताकि तुम पढ़ सको
'मन'
बिना सोचे, बिना समझे
कि
'अहसास' नहीं बांधे जाते
शब्दों में
और 'चुप्पियाँ'
गढ़ देती हैं
कहानियाँ !!अनुश्री!!

Wednesday, 8 April 2015

'तुम्हारे लिए'

'तुम'
अलग नही हुए कभी
स्मृतियों से,
जाने मन के किस कोने में
पैठ बना ली है तुमने,
यदा - कदा छा ही जाते हो
जेहन पर,
आज आँगन में फिर खिले हैं,
गुलाब
अरे बाबा ! मुझे याद है,
तुम्हें नहीं पसंद
ये फूलों का लेना देना,
ये दिखावे,
सुनो न,
फिर मिलते हैं वहीं,
दिल की जमीन पर,
जहाँ अब भी रहता है 'प्रेम'
'तुम्हारे लिए' !!अनुश्री!!


'तुम'
अलग नही हुए
स्मृतियों से कभी,
जाने मन के किस कोने में
पैठ बना ली है तुमने,
यदा - कदा छा ही जाते हो
जेहन पर,
आज दिल की जमीन पर,
फिर खिले हैं, गुलाब
जहाँ  रहता है 'प्रेम'
'तुम्हारे लिए'.... !!अनुश्री!!

Sunday, 5 April 2015

'इंतजार'

(1)
जाने कितनी ही
'कहानियाँ'
गढ़ रखी थी हमने,
हम दोनों को लेकर,
उन कहानियों में
मिलन नहीं था,
बिछोह भी नहीं था,
था तो बस,
हमारा स्नेह,
हमारे एहसास,
मीलों दूर होकर भी
एक दूसरे की कहानियों से
लिपटे हम,
उन बेचैनियों में भी
ढूंढ ही लेते थे 'सुकून' ,
'सच'
मिलन की कहानियों से
बेहतर होती हैं
 'इंतजार'
की कहानियाँ !!अनुश्री!!

(2)
अपनी आँखों में चमकते,
सितारों से कह
दिया मैंने,
मत सजाया करो,
'उम्मीद'
कि ये दर्द के सिवा,
कुछ नहीं देती,
सपने ही सजाने हैं,
'तो'
इंतजार के सजाओ,
हर रोज,
इक नयी आस,
नया  इन्तजार !!अनुश्री!!

Tuesday, 24 February 2015

स्त्री

'दहशत' 
'जिस्म' सौंपती है, 
'आत्मा' नहीं


'औरत' 
जब तक रही 
'परदे' में, 
पूजी गयी, 
सराही गयी, 
'परन्तु' 
'देहरी' लाँघते ही, 
'बाजारू' हो गयी


कुछ 'औरतें' 
पैदा होते वक़्त, 
अपनी तक़दीर में 
लिखवा कर लाती हैं, 
रात की 'कालिख़', 
कुछ टूटे सपने, 
'आँसूं', 'अकेलापन', 
'और' फिर 
तमाम उम्र, 
कलेजे से लगाये फिरती हैं, 
इक 'आस'

'चाँद' 
तुम पर 
लगा 'ग्रहण' 
ख़त्म हो जाता है, 
कुछ 'मिनटों', 
कुछ 'घण्टों', के बाद,
'परन्तु'
'स्त्री' के माथे का 'ग्रहण'
ख़त्म नहीं होता,
'उम्र भर' !!अनुश्री!!


आज शाम 
डूबते सूरज का हाथ थाम, 
मांग ही लिया मैंने 
अपनी किस्मत के लिए 
थोड़ी से रोशनी, 
जो वो बरसों से
चाँद को देता आ रहा है,
फ़क़त इतना ही कहा उसने,
'तुम्हारी' किस्मत लिखते वक़्त
'उजाला' लिखना
भूल गया था 'वो' !!अनुश्री!!


'इन दिनों' 
आसमान का सूनापन, 
उतर आया है, 
'आँखों' में, 
'चुप्पियों' ने 
आस - पास
डाल रखा है 'डेरा' !


तुझमे सौंधापन मैं भर दूँ, 
तुझमे घुल - घुल जाऊँ, 
बनके बरसूँ प्रीत पिया जी, 
आ तोहे अंग लगाऊँ 



अस्मत जो लुटी 
तो 'बेहया' 
मर्जी से बिकी 
तो 'वेश्या' 
'स्त्री' का नसीब, 
सलीब, सिर्फ सलीब 



'पुरुष' 
माफ़ कर दिए 
जाते हैं, 
'परस्त्रीगमन' के 
बाद भी, 
'स्त्रियाँ'
'परपुरुष' से नाम
जुड़ने के साथ ही,
साबित कर
दी जाती हैं,
'चरित्रहीन' !!अनुश्री!!


'स्त्री' 
जब लाँघती है 'देहरी' 
अपनों की खातिर, 
या 
सपनों की खातिर, 
उस पर लगा दिया जाता है, 
'इजी अवेलेबल' 
का ठप्पा, 
जैसे कि 'बस' 
देहरी लाँघती 'स्त्री' 
अपनी 'अस्मत' भी 
वहीँ देहरी पर, 

टाँग आई हो !!अनुश्री!! 

Friday, 20 February 2015

दिल से

'उस दिन' 
जब तुमने 
मुझे सौपते हुए, 
सागर की लहरों पर, 
लिख दिया था, 
'प्रेम'
मैंने भी
'प्रेम कविताएं'
लिखनी शुरू
कर दी थी !!अनुश्री!!


जब से
'तुम' 
मिले हो, 
'आसमाँ' का चाँद 
मद्धम पड़ 
गया !!अनुश्री!!


'तुम' 
'सुख - दुःख' से इतर, 
'स्त्री - पुरुष' से परे, 
सिर्फ और सिर्फ 
लिख दिया करो 
'प्रेम' !!अनुश्री!!


'कभी कभी' 
नाहक ही तुम्हारी 
यादों की फसल का 
लहलहा उठना, 
मन को 'हरा-भरा'
कर जाता है !!अनुश्री!!


'स्याह' 'सफ़ेद' सी जिंदगी, 
'तुम' रंग भर दो न 'सभी' 



'तुम्हारा' 
प्रेम से 
'प्रेम' 
लिख जाना, 
'मुझे' 
ज़िन्दगी दे
जाता है !!अनुश्री!


'सुनो' 
तुम्हारे शब्द नहीं चाहिये, 
'सिर्फ' एक 'स्पर्श' 
इक 'एहसास' 
कि 'तुम' 
साथ हो
'हमेशा' 'हमेशा' !!अनुश्री!!


मेरी कविताओं का नायक, 
किसी परीकथा के 
नायक की तरह ही है, 
इन दिनों, 
थोड़ा गुमसुम सा, 
उसकी उदासी पर 
कविता ही नहीं बनती, 
आजकल शब्द भी 
नाराज़ चल रहे हैं, 
शायद नायक की 
चुप्पी की वजह  
मानते हैं मुझे, 
मैं प्रयास में हूँ, 
उसके चेहरे पर 
खिला सकूँ हँसी, 
और लिखुँ एक 

मुस्कुराती सी 'कविता' !!अनुश्री!! 

'चाँद मेरे' 
प्रेम नहीं माँगता 
सम्पूर्णता, 
स्वीकारता है 'एब' 
इश्क़ करता है, 
'आदतों' से,
और हाँ,
तुम 'जिंदगी' हो,
प्रेयस नहीं,
मन की रज़ा
बस एक,
'तुम' सिर्फ 'तुम'



जब तुम्हे जाना 
इश्क जाना 
पहेली है 
दिल का जाना
तुम्हारा 
जानां हो जाना !


'तुम' 
मत बनना, 
मेरी जिन्दगी का, 
अहम हिस्सा, 
'तुम' 
बन जाना,
'मेरा'
सम्पूर्ण 'संसार


परिंदे की मानिंद, 
उड़ते वक़्त के साथ, 
मन नही उड़ पाया, 
'कभी'
वो ठहरा हुआ है 
'वहीं'
उम्र के उसी
अल्हड़ से मोड़ पर !!अनुश्री!!


जिन्दगी ये अधूरी लगती है, 
तुमसे बेहद ही दूरी लगती है, 
तुम ज़रूरत हो जीस्त की ऐसे, 
साँस जैसे जरुरी लगती है !!अनुश्री!!



दिल पे छाई है खुमारी
हर जगह सूरत तुम्हारी,
आरजू बस एक अपनी
तुम बनो किस्मत हमारी,

दिन तो जैसे -तैसे बीता
रात आँखों में गुजारी,
इक दुआ आँखों में पलती
इश्क में सब हैं भिखारी,
अब 'अनु' क्या गीत लिखे
चाह तेरी सर पे तारी !!अनुश्री!!

'कल' 
आँखों में उतर आई थी रात, 
तुम्हारी 'चुप्पी' 
निगल गयी थी, 
नींद, सपने और 
कुछ - कुछ मुझे भी 


आँखों में मेरी अपनी नज़र छोड़ गए है,
चाहत में तड़पता ये जिगर छोड़ गए है,
है होश सहर का न खबर शाम की मुझे
वो जबसे मुहब्बत का नगर छोड़ गए हैं। !!अनुश्री!!

मेरी चाहत को जख्मों की निशानी दे गया कोई, 
वफ़ा की कसमें खा कर खुश गुमानी दे गया कोई, 
जुदाई का मुझे अब उम्र भर खुद दर्द सहना है, 
मेरी आँखों को अश्कों की रवानी दे गया कोई !!अनुश्री!!

जब बेचैन होता है 
'तुम्हारे'
मन का मौसम, 
इक अभेद्य सा सन्नाटा 
रोने लगता है, 
मुझमें
'तुम्हारे' चुप
ओढ़ लेने भर से ही,
उतर जाता है,
ब्रह्माण्ड का 'कोलाहल'
उलझनों का 'गुबार'
और रच देता है
मुझमे 'उदासी' !!अनुश्री!!



'तुम्हारे' साथ होने का भ्रम ही 'सहेली' है, 
वर्ना तो जिंदगी, आज भी 'अकेली' है


'जिंदगी' जिन्दा होने का 'एहसास' भर है, 
हर बार इक नयी 'आस' भर है !!अनुश्री!!


कितना कुछ अनबोला
अनकहा रह गया
'मन' तुम संग बह गया 
तो बह गया
आँखों ने आँखों से
बातें कर ली
होठों ने होठों पर
चुप्पी धर दी
उफ़!! साइलेंट ही रह गया
'हमारा'
साइलेंट लव !!अनुश्री!!


'सुनो' 
तुमने बाँध लिया है, 
साँसों का तार -तार
'तुम' से,
'तुम' 
मेरे 'सर्वस्व'
मेरे 'प्रेम'
'तुम्हें' चाहा ही नहीं
'पूजा' है
'सुगम' नहीं होता,
प्रेयसी से दासीत्व
तक का सफर !!अनुश्री!!