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Monday, 4 May 2015

समन्दर 'और' नदी

समन्दर ने कहा,
'नदी, ओ नदी,'
'मुझे प्रेम है तुमसे,
आओ, समाहित हो जाओ मुझमें',
'नदी', जो बरसों से समन्दर के
प्रेम में थी,
इस आमंत्रण से प्रसन्न हो,
पूर्ण वेग से दौड़ पड़ी,
समन्दर के आगोश में समा जाने को,
अपने अन्जाम से 'बेखबर'
समन्दर तो समन्दर ठहरा,
उसमें समा कर
'नदी', नदी रह ही कहाँ जाती है,
समन्दर का हो जाने की चाहत में,
खो देती है,
अपना अस्तित्व,
अपनी पहचान,
'और' समन्दर,
एक नदी को स्वयम में समाहित कर,
तलाशने लगता है
'दूसरी नदी' !!

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