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Thursday, 28 May 2015

झील

'प्रेम' 
में होना, 
जैसे झील हो जाना, 
ऊपर से सब शान्त 
और भीतर कोलाहल, 
लेकिन मैं 'प्रेम' में हो कर भी 
झील नहीं बनती
समेट लेती हूँ ,
अपने मन की तमाम
हलचलों को,
ओढ़ लेती हूँ 'चुप' ,
वो 'चुप्पी' मुझमे रच देती है,
इक नयी 'आकाशगंगा',
और मैं उस 'आकाशगंगा' में
गढ़ लेती हूँ इक नया 'संसार',
इस धरातल से परे,
मेरा अपना धरातल,
मेरी अपनी दुनिया,
जहाँ कोई नहीं होता,
सिवा 'मेरे' और
'मेरे अहसास' के !!अनुश्री!!

1 comment:

  1. प्रेम की पराकाष्ठा यही है ... झील हो जाना ...

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