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Tuesday, 2 June 2015

'प्रेम' ऐसा भी होता है क्या?

'प्रेम' ऐसा भी होता है क्या?
मिले तो यूँ,
कि जैसे जन्मों से साथ थे,
बिछड़े तो यूँ,
जैसे कि पहचान ही न थी,
तुम्हारा चले जाना,
स्वीकार नहीं होता,
बिना कुछ कहे,
बिना कुछ बताये,
कम से कम मेरा दोष तो बता देते,
बताते तो सही,
कब, कहाँ मैंने आहत किया तुम्हें ?

तुम्हें दोष नहीं दे रही,
कोई शिकायत भी नहीं कर रही,
याद है तुमने कहा था,
"बिलकुल पगलिया हो तुम,
जमाना नहीं समझती" ,
उस वक़्त लगा था,
'तुम'
मजाक कर रहे हो,
लेकिन नहीं,
कितना -कितना सच कहा था तुमने,
सचमुच 'पगलिया' थी मैं,
नहीं समझ पायी 'जमाना'
तुम्हें भी, कहाँ समझ पायी मैं .........

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