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Friday, 26 June 2015

बलात्कार

बालात्कार  से पीड़ित लड़कियाँ,
बचाये रखना चाहती हैं
अपनी जिजीविषा,
फूँक देना चाहती हैं,
स्याह  अतीत,
मन की पीड़ा,
कौमार्य की टूटन,
तार हुए दामन का
एक - एक टुकड़ा।
छटपटाती हैं कि निकल जायें
जिस्म के लिजलीजेपन  से बाहर,
धुल लेना चाहती हैं 'मन'
कई - कई बार नहा कर।
जाने कितनी ही बार सिलती हैं
'मन',
परन्तु अखबार की  एक खबर
 'बलात्कार',
उधेड़ कर  रख देती है सारी सीलन।
रिसने लगता है रक्त।
पागलों की तरह नोचती हैं
अपना ही जिस्म,
एक - एक छुवन
नोच फेंक देना चाहती हों जैसे।
वक़्त के चाँटे
सूखने नहीं देते आँसू,
उगने नहीं देते मुस्कान।
जिस्म का जख्म
एक - एक कर भर भी जाये तो क्या,
 कैक्टस की तरह फैलते हैं
'मन' के जख्म।
वक़्त और समाज इन्हें भरने नहीं देता,
बल्कि खुरच - खुरच कर
बना देता है 'नासूर' !!अनुश्री!! 

1 comment:

  1. सच लिखा है ... समाज ऐसे घावों को भरने नहीं देता ... टीस देता ही रहता है ...

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