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स्त्री के मन की थाह

एक स्त्री के मन की
थाह लेना, 
ब्रह्मा के वश में भी नहीं, 
तुम तो मात्र तुच्छ मनुष्य हो,
तुमने सोच भी कैसे लिया 
कि जिस चक्रव्यूह को
ब्रह्मा भी नहीं भेद सके,
उसे भेदने का सामर्थ्य तुममे होगा,
तुम्हें क्या लगा,
तुम स्नेह और प्रेम का
आवरण ओढ़ कर आओगे
तो उसे अपने छले जाने का एहसास नहीं होगा,
तुम ग़लत हो पुरुष,
एकदम ग़लत,
उसे पता होता है ख़ुद के छले जाने का,
लेकिन वो जिसे प्रेम करती है न,
उसके लिए खुद को बिखेरने में भी
संकोच नहीं करती,
वो छली भी जाती है तो उसकी अपनी मर्ज़ी से,
न कि तुम्हारे चाह लेने से,
उसे पता होता है प्रेम के उस पार पीड़ा है,
गहन अन्धकार है,
फिर भी वो तुम्हारी चंद दिनों की ख़ुशी के लिए
उम्र भर के लिए उस पीड़ा और अन्धकार का वरन करती है,
तुम नहीं समझ सकते,
प्रेम में छले जाने का सुख,
किसी के लिए खुद को
बिखेर देने का सुख,
किसी के नाम की माला फेरते - फेरते
जोगन बन जाने का सुख,
किसी के इश्क़ में फ़ना हो जाने का सुख ..... !!अनुश्री!!

तुमने कहा

तुमने कहा -
खुद को मेरी नज़र से देखो,
दुनिया का सबसे खूबसूरत चेहरा हो तुम।
"उसने मान लिया।"
तुमने कहा - 
तुम्हारी आँखें हमेशा कुछ बोलती हैं मुझसे,
या यूँ कहूँ, बोलती सी हैं तुम्हारी आँखें।
"उसने मान लिया।"
तुमने कहा -
तुम्हारी आवाज़ कलेजा चीर कर
रूह तक जा पहुँचती है।
"उसने मान लिया।"
तुमने कहा -
जब तुम्हारे साथ होता हूँ,
खुद के साथ नहीं होता।
"उसने मान लिया।" फिर तुमने कहा -
आज बात नहीं हो पायेगी,
व्यस्त हूँ बहुत।
"उसने मान लिया।"
तुमने कहा -
तुम्हें नहीं लगता,
तुम्हें खुद को थोड़ा इम्प्रूव करना चाहिये।
"उसने मान लिया।"
तुमने कहा -
आज वहाँ नहीं मिलते,
लोग जानते हैं मुझे, बदनामी होगी।
"उसने मान लिया।"
अंत में तुमने कहा -
सुनो, मुझे बढ़ना है आगे,
बुनना है एक नया सपना,
रचनी है एक नयीं दुनिया।
"उसने, ये भी मान लिया।" ..... !!अनुश्री!!

Jane kyu

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तुम्हारा लौटना

तुम्हारा लौटना
यूँ कि जैसे
बहार उतर आई हो
आंगन में,
यूँ कि जैसे
गुलमोहर
खिलखिला पड़े हों,
तुम्हारे बाद
हाथ छुड़ा गयी थीं
प्रेम कवितायें,
गुम हो गए थे
जज़्बात,
तुम्हारा लौटना,
जैसे कि
जिन्दगी लौट आई ...!!अनुश्री!!

प्रेम का गणित

मैं 
नकारती हूँ, 
देह, आँखें, दिल और 
प्यार की दुनिया, 
स्वीकारती हूँ, 
धुंध, सपने,
जिस्मों के उस पार
की दुनिया..... !!अनुश्री!!



वो पढ़ रही है,
प्रेम का गणित,
उसके अनगिनत कोण,
उसने पढ़ा कि
प्रेम नहीं रहता, 
एक बिंदु पर
टिक कर कभी,
बदलता रहता है
स्वरूप,
उसने पढ़ा कि
दो समान्तर रेखायें
जुड़ कर
बदल सकती हैं एक रेखा में,
परन्तु
त्रिकोण नहीं हो सकते एक,
इन दिनों वो
लिख रही है
उदासी ..... !!अनुश्री!!


उसने कहा
'खुद को मेरी नजर से देखो'
वो शामिल हो गयी
दुनिया की सबसे
खूबसूरत औरतों में,
इन दिनों उसे
दिखने लगे हैं
अपने चेहरे पर उगे
तमाम तिल,
हज़ारों निशान...!!अनुश्री!!



प्रेम राग

प्रेम,
कभी -कभी 
 भ्रम में होना भी, 
कितना सुकून देता हैं न, 
और वो भी 
तुम्हारे होने के भ्रम से
ज्यादा खूबसूरत
क्या होगा भला,
इधर,
वो हार जाना चाहती है, दुःख,
उधर,
दर्द जीत लेना चाहता है उसे,
तुमने कहा,
तुम लौट जाना चाहते हो,
अपने ख़्वाहिशों के गाँव,
बुनना चाहते हो
एक रंगीन सपना,
तुम्हें पता है,
उसे सपने नहीं आते अब,
उसने सपनों की जगह
जड़ लिया है तुम्हें,
अपने भ्रम जाल से
बाहर निकलना
सीखा ही नहीं उसने,
सुनो,
वो भी गुनगुनाना चाहती है,
नदी गीत,
लिखना चाहती है,
प्रेम राग.... !!अनुश्री!!

मुझमें 'तुम'

तुम समेट लेना चाहते थे,
मुझमें से 'तुम',
परन्तु
तमाम प्रयासों के बाद भी,
शेष रह गया,
थोड़ा सा अहसास,
आकाश भर प्रेम,
अंजुरी भर याद,
चाँद भर स्नेह,
काँधे का तिल,
तुम्हारी देह गंध,
या यूँ कहूँ,
नहीं निकाल पाए तुम,
मुझमें से 'तुम' !!अनुश्री!!