Text selection Lock by Hindi Blog Tips

Tuesday, 25 November 2014

मुक्तक


(१)
इश्क़ में जब दर्द पाया आँख ये रोती रही,
दिन सिसकता था यहाँ 'औ' रात भी रोती रही,
तुम हुए जो बेवफा तो शब का ये आलम रहा,
चाँद जागा रात भर पर चाँदनी रोती रही !!अनुश्री!!

(२)
याद तेरी इस दिल में दर्द धुन बोती रही,
रात मेरे आँसुओं के बोझ को ढोती रही,
ग़मज़दा मुझे देख कर आसमाँ ने ये कहा,
चाँद जागा रात भर पर चाँदनी रोती रही !!अनुश्री!!


इक चंचल नदिया सी मुझमें अब भी बहती है कहीं, 
खुशियों की इक चादर ओढ़े, सब दुःख सहती है कहीं,
मतलब की दुनिया से छुपकर मेरे दिल में सोई है 
वो लड़की पगली सी मुझमें, अब भी रहती है कहीं, !!अनुश्री!!

तुम्हारे दिल में जो गम हैं, उन्हें मेरा पता देना, 
कभी जो ख्वाब बदलें तो, धीरे से जता देना, 
मेरी चाहत के नग्मों से, 'औ' मेरे दिल के जख्मों से, 
तुम्हे दामन छुड़ाना हो तो फिर आ कर बता देना !!अनुश्री!!

Tuesday, 11 November 2014

Ehsaas

तुम क्या जानो किस पीड़ा से अन्तर्मन गुजरता है, 
कोई डगर हो, कोई दर हो, इक पल भी न ठहरता है, 
तुम फूलों के बीच पले हो, पीर पराई क्या जानो, 
गम की तपती आँच में जलकर ये जीवन पिघलता है !!अनुश्री!!


'प्रेम' 
नहीं है तुमसे, 
'तुम' 
यादों में भी नही, 
याद बस इतना ही है, 
'तुम्हे'
भूलना है,
अपने अंतहीन
सफर से पहले,
जीवन की आखिरी
डगर से पहले !!अनुश्री!!




प्रेम के बादल
देखो आये
घिर घिर के,
'नेह' तेरा गर
मिल जाये,
'ये' जीवन
'जीवन' हो जाये !!अनुश्री!

'इंतजार' मुहब्बत का नसीब है, 
तू दूर सही दिल के करीब है !!अनुश्री!!

'प्रेम' 
नहीं बीतता 
वक़्त के साथ, 
'वक़्त' 
तेज़ी से 
बीत जाता है,
'प्रेम' के साथ !!अनुश्री!!


कर न सको गर वफ़ा सफर में, साथ मेरे तुम चलना मत, 
बेवफाई का नमक कभी, मेरे जख्मों पर मलना मत, 
फिर भी कोई रूप की गागर मन को गर भरमाये तो, 
मुझसे आ कर के धीरे से, कह देना पर छलना मत, !!अनुश्री!!




Friday, 31 October 2014

इंतजार मत करना

'हमारी'
जद में नहीं था,'तुम्हारा' रोक लेना,
और मेरा, रुक जाना
'तुम' रूह में हो,
'तुम' ख्वाबों में,
तुम्हारी ही खुशबू है,
मन के गुलाबों में,
लेकिन
दरम्यां फासले बहुत हैं,
कुछ जाने से,
कुछ अनजाने से,
'सुनो'
इंतजार मत करना,
मेरा 'लौटना'
मुमकिन न हो 'शायद' !!अनुश्री!!

प्रेमिका

मुझमे,
नहीं है,
इक अदद
प्रेमिका के गुण,
नहीं आता मुझे,
प्रेम निभाने का शऊर,
'तुम्हारे'
सवालों के जवाब में,
ओढ़ लेती हूँ,
'एक'
गहन चुप्पी,
नहीं जान पाती,
तुम्हारी
आँखों के,
अनकहे अनुबन्ध,
तुम्हें ले कर,
स्वतः ही गढ़ लेती हूँ,
हज़ारों कहानियाँ,
कभी बता नहीं पायी तुम्हें,
मुझे भी पसन्द है,
तुम्हारे साथ,
आकाश के तारे गिनना,
नदी की धारा के,
संग संग बहना,
'हाँ',
तुम्हारी धड़कनों पर
लिखी इबारत,
नहीं पढ़ पाती मैं,
नहीं समझ पाती,
'कब' 'क्या'
कहना चाहते हो तुम,
'शायद'
मुझमे,
नहीं है,
इक अदद
प्रेमिका के गुण.. !!अनुश्री!!



Saturday, 20 September 2014

चाँद

चाँद,
'तुम' यूँ मुस्कुराते हुए,
जब रात की देहरी पर
लिख देते हो 'प्रेम'
मैं मोहित हो जाती हूँ,
भूल जाती हूँ
अपनी 'परिधि'
तुम हो जाते हो 'सर्वस्व',
लेकिन तुम्हे चाह लेना
ही तो 'जिंदगी' नहीं न,
तुम 'आकर्षण' हो,
'दुनिया' नहीं न,
'सुनो'
तुम बार - बार
मत लिखा करो
'प्रेम'
!!अनुश्री!!


Monday, 15 September 2014

सुख दुःख,

दुनिया रस्ता टेढ़ा मेढ़ा, जीवन बहता पानी है, 
मंजिल पर पंहुचा है वो, जिसने हार न मानी है, 

सुख दुःख, दुःख सुख की बातों पर, देखो दुनिया है मौन धरे, 
जीवन में गर दुःख न हो तो, ख़ुशी की इज्जत कौन करे, 
हर घर और आँगन की, यही एक कहानी है। 
मंजिल पर पंहुचा है वो, जिसने हार न मानी है, 

गर स्त्री बन आयी हो तो, इसका तुम अभिमान करो, 
कुछ भूलो तो भूलो लेकिन, इतना हरदम ध्यान करो, 
रानी लक्ष्मी बाई की गाथा, रखना याद जुबानी है। 
मंजिल पर पंहुचा है वो, जिसने हार न मानी है, 

बाधाओं से डर कर रुकना, है जीवन का नाम नहीं, 
तूफानों के आगे झुकना, इंसां तेरा काम नहीं, 
हर मुश्किल को पार करे वो, क़दमों में जिसके रवानी है। 
मंजिल पर पंहुचा है वो, जिसने हार न मानी है,

गंगा

गंगा तेरी बहती धारा
जाने कितनो का तू सहारा

तू जीवन,तू मोक्षदायिनी,
तू निर्मल, तू पतितपावनी
जीवन तो है चलते जाना
जीवन का है तू ही किनारा
गंगा तेरी बहती धारा

तेरी छत्रछाया में बहते
जाने कितने जीवन पलते
तू रोजी रोटी कितनो की
कितनों का संसार सारा
गंगा तेरी बहती धारा

तेरे जल ने जो घुल जाये
उसका मन पावन हो जाये
तू ही मन के मेल मिटाती
तुझसे ही उद्धार हमारा ||
गंगा तेरी बहती धारा 

Friday, 1 August 2014

'प्रेम' 'संवेदना'

एक दिन
'बो' दी थी
संवेदना 'तुम्हारे'
नाम के साथ,
'और'
पनप उठा था प्रेम,
खिले थे फूल,
महक रही थी हवाएँ,
वो मादक हँसी लहरों की,
बरसे थे बादल
भींगा था 'मन'
इस पौधे को
साल -दर -साल
बढ़ने के लिए
चाहिए था,
तुम्हारा 'प्रेम'
तुम्हारा 'साथ'
तुम्हारी 'संवेदना'
इतना तो जानते हो न
कोई भी पौधा
बिना खाद पानी के
मुरझा जाता है,
'कदाचित'
इसकी किस्मत में
भी यही लिखा था,
मुरझा गया 'प्रेम'
सूख गयी 'संवेदना'
बचा रह गया 'ठूँठ'
'अब'
मुझमें नहीं पनपता 'प्रेम'
नहीं जन्मती 'संवेदना' !!अनुश्री!!  

Wednesday, 23 July 2014

क्षणिकाएँ

'मन' बंजर 'जमीं' जैसे, 
आँखों में है 'नमीं' जैसे 
'रंग' नहीं है जीवन में, 
तेरी ही हो 'कमी' जैसे !!अनुश्री!!


'प्रेम' 
तुम चले गए, 
'परन्तु' 
वक़्त के 
तेज बहाव के साथ 
तुम्हारा
'प्रेम' नहीं बहा, 
मन के
किसी कोने में, 
स्थिर है कहीं। .!!अनुश्री!!

Friday, 23 May 2014

तुम्हारा प्रेम

तुम्हारा प्रेम 
उधार रहा मुझ पर, 
क़िस्त -दर - क़िस्त 
चुकाना है मुझे, 
'तुम' 
मेरे जीवन के 
आधार स्तम्भ, 
मेरे मन के 
महासिन्धु में 
बहती जलधारा, 
स्नेह और प्रेम की
जो भाषा
तुमसे सीखी है,
ब्याज समेत
समर्पित करना
चाहती हूँ तुम्हें,
तुम्हारे लिए,
तुम्हारी ही 'मैं' !!अनुश्री!!



तमाम बंदिशों के बाद भी मुसलसल कोशिशें जारी रहीं, 
तेरी दीवानगी, हाँ दीवानगी ही सिर पे तारी रही 
फ़क़त तू ही नहीं लिखा था हाथों की लकीरों में, 
वर्ना तो सारी क़ायनात ही हमारी रही !!अनुश्री!!

Sunday, 11 May 2014

"माँ"

"माँ"
'कैसी हो तुम?'
'उम्मीद है, अच्छी होगी।'
यही दो - चार जुमले,
जो हर ख़त में लिखती हूँ मैं,
ये जानते हुए भी 'माँ'
कि अब 'तुम्हारा' शरीर
तुम्हारा साथ नहीं देता,
उम्र जो हो चली है,

जर्जर होती देह के साथ,
मन भी टूटता जा रहा,
और फिर
'पापा' भी तो नहीं हैं,
एक औरत के लिए,
इससे बड़ा घाव
कहाँ होता है 'कोई',

जानती हूँ,
रोती होगी, हर रात,
तकिये में मूँह छिपा कर,
भुगतती होगी,
अपना अकेलापन,
भरे पुरे परिवार
के बीच भी,

हर बार की तरह,
इस बार भी पड़ी होगी,
भीषण ठण्ड, 'पर',
ये ठंडी हवाएं भी,
नहीं सुखा पायी होंगी,
'तुम्हारी' आँखों का गीलापन,
'शॉल' हाथों में लिए,
इंतजार करती होगी,
कोई कहे 'तो,
'शॉल ओढ़ लो,
कान ढँक लो,
वर्ना ठण्ड लग जायेगी !!'
'और' रो पड़ती होगी,
ज़ार जार,

सब जानती हूँ मैं 'माँ',
लेकिन नहीं चाहती,
कि तुम्हारे जख्म कुरेद कर,
तुम्हे दुःख पहुँचाऊँ,
पल - पल 'तुम्हे'
तुम्हारी कमजोरी,
तुम्हारे अकेलेपन का
एहसास कराऊँ,

इसलिए माँ,
'सिर्फ' इसलिए,
अपने हर ख़त में
लिखती हूँ 'मैं',
"कैसी हो माँ ?
उम्मीद है, अच्छी होगी। "

!!अनुश्री!!

Tuesday, 29 April 2014

'प्रेम'

'प्रेम' 
बार बार 
लिखती हूँ तुम्हें 
'ताकि' 
तुम्हारी अनुभूतियाँ 
'यहीं' 
मेरे आस पास 
डोलती रहें, 
तुम महज 
प्रेम नहीं हो, 
'तुम' आत्मा हो,
'तुम' साँस हो,
तुम मेरे जीवन का
एक-एक पल,
मेरी इच्छा,
मेरा मान,
'और'
तुम्हीं तो हो,
'मेरे आराध्य' !!अनुश्री!!

Friday, 25 April 2014

'प्रेम'

'प्रेम' 
तुम्हारा प्रेम 
पारस था, 
और मैं, 
पत्थर, 
तुमने मुझे 
प्रेम कर के 
खरा सोना 
बना दिया, 
सबकी समझ 
से परे है,
'तुम्हारा'
'मुझे' मेरे ही लिए
छोड़ जाना,
उसे या तो
मैं समझती हूँ,
या फिर
सिर्फ तुम !!अनुश्री!!
(प्रेम अनकहे शब्दों का संसार है, जिसे सिर्फ दिल समझता है )

Thursday, 24 April 2014

'प्रेम'

'प्रेम'
कैसे मान लूँ,
तुम्हे
प्रेम नहीं था मुझसे,
तुम्ही ने तो कहा था,
'तुम इतनी प्यारी हो
कि तुम पर
प्यार के सिवा
कुछ आता ही नहीं',
'प्रेम मेरे'
कहाँ से सीखा तुमने,
मौसम के साथ
बदल जाने का हुनर,
कभी पहाड़ के
उसी टीले पर,
महसूस करना
हवाओं को,
आज भी
हमारे प्यार की
सौंधी ही खुशबू
उड़ती हैं वहाँ,
तुम्हारी
खिलखिलाती हँसी,
रूठना, मानना,
और एक दूसरे को
पा लेने की ख़ुशी,
'सुनो'
वहाँ थोड़े आँसूं भी होंगे,
हमारी आखिरी मुलाकात
पर छलके आँसूं ,
उन्हें छेड़ना भी मत,
दिल की जमीन को,
थोड़ी नमी की
जरुरत होती है,
ताकि
दिलों में यादें
पनपती रहें !!अनुश्री!! 

Tuesday, 22 April 2014

कुछ शेर

सागर से मिल के दरिया, इतना ही रह गया,
इक बूँद मेरे इश्क़ का, जो तुझमे घुल गया !!अनुश्री!!

तुझको तेरे ही लिए छोड़ जाना चाहती हूँ, 
सांसों की हर बंदिशें तोड़ जाना चाहती हूँ, !!अनुश्री!!

तुम्हीं को जोहती हैं ये निगाहें, लौट आओ तुम, 
तुम्हारा नाम लेती हैं ये आहें, लौट आओ तुम !!अनुश्री!!

ये न सोचों कि खुशियों में बसर होती है,
कई महलों में भी फांके की सहर होती है !

उसकी आँखों को छलकते हुए आँसूं ही मिले,
वो तो औरत है, कहाँ उसकी कदर होती है,

कहीं मासूम को खाने को निवाला न मिला,
कहीं पकवानों से कुत्तों की गुजर होती है,

वो तो मजलूम था, तारीख पे तारीख मिली,
जहाँ दौलत हो इनायत भी उधर होती है,

दिन गुजरता है काम करते, रात सपनों में,
जिंदगी ग़रीब की ऐसे ही बसर होती है !!अनुश्री!!

Sunday, 20 April 2014

'प्रेम'

'प्रेम' 
तुम्हे बार बार 
लिख पाना, 
सरल नहीं होता, 
फिर फिर
जीना पड़ता है 'प्रेम', 
भोगनी होती है 
पीड़ा, 
चाँद को बनाना 
पड़ता है, 
रतजगे का साथी, 
बुनने होते हैं, 
कई सारे सपने, 
और फिर सहना 
पड़ता है, 
उनके 
टूट जाने का दंश, 
'नहीं'
तुम्हे बार बार 
लिख पाना, 
सरल नहीं होता। !!अनुश्री!!

ग़ज़ल

तुम नहीं तो अब तुम्हारी याद का मैं क्या करूँ?
आँख से बहती हुई बरसात का मैं क्या करूँ?

लौट आओ कि तुम्हारा रास्ता तकती हूँ  मैं,
बिन तुम्हारे जगमगाती रात का मैं क्या करूँ?

ग़र उतरना जंग में तो साथ कुछ हिम्मत भी रख,
हौसला दिल में नहीं तो बात का मैं क्या करूँ ?

लोग कहते हैं गया फिर लौट कर आता नहीं,
तेरी यादों में घुले  लम्हात का मैं क्या करूँ?

दिल लगा कर दिल्लगी की काम ये अच्छा न था,
तुम  कहो इस अनछुए जज़्बात का मैं क्या करूँ?!!अनुश्री!!

Thursday, 3 April 2014

राजनीति

(1) 

बूँद- बूँद से भरती गागर, 
बूँद बूँद से प्यास मिटे, 
बूँद बूँद से बनता सागर, 
बूँद बूँद से तृप्ति मिले, 
तो अपने वोट की कीमत जानो, 
देश में अपना स्थान पहचानो, 
इक इक वोट से सत्ता बदलती, 
अपने को न दुर्बल जानो, 
नयी कोपलें फूटेंगी और, 
नव युग का निर्माण होगा, 
जन जन की खुशियों से सजकर, 
देश का निर्माण होगा। !!अनुश्री!!

(2)
चंद टुकड़ों पर कुत्तों को झगड़ते देखा, 
एक धमाके में सैकड़ों को मरते देखा, 
सत्ता और राजनीति की आँच ही कुछ ऐसी है, 
अच्छे अच्छों का ईमान पिघलते देखा !!अनुश्री!! 



Wednesday, 19 March 2014

नेता

बीवी बोली नेता से, ए जी जरा सुनते हो, हमरी भी बात पे गौर जरा कीजिये,
बहुत ही दिन हुआ, कहीं हम घूमे नहीं, अबकि हमको गोआ घुमा दीजिये,
नेता बोले, बीवी जी एक बात कहते हैं, कुछ दिन अपना मुँह बंद कीजिये,
गोआ क्या चीज़ है, लंदन घुमायेंगे हम, एक बार हमको जीत जाने दीजिये !!अनु !!


मौसम है चुनाव का, पार्टियों के नेता भी, अपनी अपनी चालों की गोटियाँ हैं फेंक रहे,
कोई हाथ जोड़े खड़ा, कोई पैरों पे है पड़ा, तरक्की और विकास के वादे भी अनेक रहे,
कहीं जातिवाद को रगड़ा, कहीं धर्म का है झगड़ा, वोटों को बटोरने के तरीके सबके एक रहे,
सियासी ये भेड़िये, दंगों की आंच पर, अपनी अपनी राजनितिक रोटियाँ हैं सेंक रहे। !!अनु!!

Saturday, 15 March 2014

होली है !!

बुरा न मानो होली है !!

हर्ष से श्रृंगार कर आया जो फागुन तो, खुशियों की वेणी से द्वार सजने लगे,
पुलकित हुआ मन झूम उठा अंग अंग, अधम, कपट और द्वेष तजने लगे,
उठी जो मनोहर प्रेम की तरंग तो, मन की वीणा के सितार बजने लगे,
चढ़ा जो असर तो शहर के बूढ़े भी, राम नाम छोड़ कर प्रेम भजने लगे !!अनुश्री!!


आ गुलाल कोई मले, या मुझे  रँग लगाय,
जो पी के रँग मैं रँगू , मन फागुन हो जाय !!अनुश्री!!

कान्हा तेरे रूप की, गागर यूँ भरमाय,
मन मेरा है बावरा, तेरी अलख जगाय !!अनुश्री!! 

Wednesday, 12 March 2014

'चाँद'

'चाँद'
तुम चाहो या न चाहो,
गाहे - बगाहे तुम्हे
पा  लेने की आस,
उग ही जाती है
'मन में'
पूरे हौसले और
जीत जाने के
जज्बे के साथ,
भर्ती हूँ उड़ान,
'तुम तक'
पहुँचती  तो हूँ,
लेकिन उसके पहले ही,
ये अमावस
तुम्हे अपने अंक में समेट
छुपा लेता है,
और मेरे हिस्से
लिख देता है
'इंतजार'
'चाँद'
तुम्हें पा लेने की
ख्वाइश,
नहीं तोड़ती दम,
उम्मीदों के बेल,
मुरझा तो जाते हैं,
पर सूखते नहीं,
इन्हे फिर से
दूंगी, थोडा हौसला,
थोडा जज्बा,
और
तैयार हो जाउंगी,
भरने को,
'इक नयी उड़ान। !!अनु!! 

Tuesday, 11 March 2014

'प्रेम'

'प्रेम'
तुम्हारे यूँ विदा कह देने
भर से ही,
विदा नही हो जाती 'साँसे'
विदा नही होती 'यादें'
विदा नही होते हैं वो 'लम्हे'
जो हमने साथ गुज़ारे
'और' न ही विदा होते हैं
वो 'एहसास'
जो अब मेरा वजूद बन चुके हैं,
'तुम'
मेरी पूरी कायनात,
'मेरा' रचा बसा संसार,
तुम्हे आभास भी हैं,
तुम्हारे विदा कह देने से,
थम जाता है सफ़र,
रुक जाती है धड़कन,
'प्रेम'
तुम्हे 'तुमसे'
खुद के लिए माँग लूँ?
बुरा तो नहीं मानोगे न ..
तुम्हारी ही 'मैं' ......... 

Monday, 3 March 2014

दोहे

ये जग अम्बर और धरा, सब जाती मैं जीत,
गर मेरे मन आ बसै, वो मेरे मनमीत !!अनु!!

लाख छुपाऊँ छुपै नहीं, ये हिरदय की पीर, 
पलकों की जद तोड़ के, बह जाता है नीर !!अनु!! 

रंग-अबीर-गुलाल सब लाख लगावै कोय.
जब मोरे सजना रँगैं तबहीं होरी होय ।

नहीं नफा-नुकसान कुछ,ये ऐसा व्यापार, उसकी होती जीत है, जो दिल जाता हार !!


लोक लाज सब छोड़ी कै, करती हूँ इकरार,
सोना तो बेमोल है, लाख टके का प्यार !!अनु!!



Sunday, 16 February 2014

कविता - रसोई से

कविता - रसोई से 

'जिंदगी'
तू क्यूँ नहीं हो जाती,
उस बासी रोटी के समान,
जिसे तवे पर रख,
दोनों तरफ से घी चुपड़,
छिड़क कर थोड़ा सा नमक,
तैयार कर लेती,
कुरकुरी और चटपटी
सी 'जिंदगी'
या फिर,
उसके छोटे छोटे टुकड़े कर,
छौंक देती कढ़ाही में,
ऊपर से डालती,
दूध और शक्कर,
और जी भर उठाती,
प्रेम और अपनेपन
से सजी,
'जिंदगी' के मजे। .!!अनु!!

Tuesday, 4 February 2014

बसंत

'लो'
फिर आ गया बसन्त,
प्रेम का उन्माद लिए,
प्रियतम की याद लिए,

'बसन्त' तो मेरे
मन का भी था,
रह गया उम्र के
उसी मोड़ पर,
लौटा ही नहीं,
जिंदगी उस
फफोले की मानिंद है,
जो रिसता  है
आहिस्ता आहिस्ता,
बेइंतहां दर्द के साथ,
परन्तु सूखता नहीं,

नहीं खिलता
मेरे चेहरे पर,
सरसों के फूल का
पीला रंग,
पलाश के फूल
हर बार की तरह
इस बार भी
मुझे रिझाने में
नाकामयाब रहे,

तुम्हारी यादों के
चंद आँसूं,
पलकों पर सजा
'कभी कभी'
इतरा लेती हूँ
'मैं भी'

ओ मेरे जीवन के श्रृंगार,
मेरे पहले प्यार,
'तुम' आओ
तो बसंत आये। .!!अनु!!


Friday, 31 January 2014

ज्वालामुखी

पनपता है 'दिल में', 
इक 'जिन्दा' ज्वालामुखी, 
भावनाओं का वेग, 
पूरे उफ़ान पर, 
'फट' पड़ने को आतुर, 

जानती हूँ, 
फटने से 
दरक जायेंगे 
'रिश्ते' 
टूट जायेंगे, 
'बंधन' 
और 'नारीत्व' 
तोड़ने में नहीं 
जोड़ने में है, 
रख देती हूँ, 
'मुहाने' पर, 
झूठी 'आशाओं', 
'उम्मीदों' 
और 'दिलासाओं' 
का पत्थर, 
ताकि, 
घुट कर रह जाएँ, 
'सिसकियाँ' 
सूख जाएँ 'आँसूं' 
हसरतें तोड़ दे 'दम' 
'जिन्दा' ज्वालामुखी 
हो जाये, 
'सुप्त' 'इसका' 
मृतप्राय हो जाना, 
नहीं है, 
'मेरे बस में' । !!अनु!!

Tuesday, 28 January 2014

नहीं 'छलकता'

नहीं 'छलकता', 
मेरी आँखों से 
खारे जल का 
एक भी कतरा, 
'माँ ने' घुट्टी में, 
पिलाई है, 
दर्द को जब्त 
करने 
की कला, 

'दिल' के घाव,
रिसते हैं,
भीतर ही भीतर,
खून का पानी हो जाना,
बदस्तूर जारी है,
ये अब जुल्म पर
उबलता ही नहीं,
ग़म में पलकों से,
बहता भी नहीं,

'जानती हूँ',
नम आँखों के साथ,
होठों पर मुस्कान,
सजाये रखने की कला,
होठों को भींच कर,
चीखों को गले में ही,
घोंट लेने की कला,
आखिर,
माँ ने जो सिखाई है,
दर्द को जब्त
करने
की कला। .!!अनु!!

Tuesday, 14 January 2014

सरस्वती वंदना

हे हंसवाहिनी, हे शारदे माँ,
विद्या का तू उपहार दे माँ,
जीवन पथ पर बढ़ती जाऊँ,
अपनों का विश्वास बनूँ माँ,
अंधियारे को दूर भगा दूँ,
ऐसी तेरी दास बनूँ माँ,
तेरी महिमा जग में गाउँ ,
अधरों को तू उदगार दे माँ,
हे हंसवाहिनी, हे शारदे माँ,
विद्या का तू उपहार दे माँ,
मधु का स्वाद लिए है ज्यो अब,
विष का भी मैं पान करूँ माँ,
फूलों पर जैसे चलती हूँ,
शूलों को भी पार करूँ माँ,
तूफानों में राह बना लूँ,
ज्ञान का तू भण्डार दे माँ ,
हे हंसवाहिनी, हे शारदे माँ,
विद्या का तू उपहार दे माँ.. 

Monday, 13 January 2014

'मुझ पर'

'मुझ पर' 
नहीं लिखी जा सकती, 
कोई 'प्रेम'
कविता, 
नहीं लिखे जा सकते हैं 
गीत, 
'मैं' नहीं उतरती,
सुंदरता के मानकों
पर खरी,
जिसमे निहायत ही जरुरी है,
चेहरे पर 'नमक' का होना,
'जरुरी है', आँखों में
शराब की मस्ती,
'और' इससे भी जरुरी है,
'जिस्म' का सांचे में ढला होना,
'मुझ पर तो'
कसी जाती हैं फब्तियां,
लिखा जाता है व्यंग,
जिस्मों को पढ़ती,
उन पर गीत लिखती 'नजरें'
क्यूँ नहीं पढ़ पाती,
आत्मा की चीत्कार,
'उनकी वेदना',
'क्यूँ' तन की सुंदरता
भारी पड़ जाती है,
मन की सुंदरता पर ??? !!अनु!!

Friday, 3 January 2014

ग़ज़ल

लम्हा लम्हा ये मन यूँ पिघलता रहा,
उसके सीने में दिल बन धड़कता रहा।

उसकी चाहत की खुश्बू हवा बन गयी,
सुबह से शाम तक वो महकता रहा।

तेरे जाने का ये दिल पे आलम रहा,
रात रोती रही दिन सिसकता रहा।

उनके पहलु में देखा किसी और को,
शमा बेदम हुई दिल सुलगता रहा।

मेरी नजरों में वो बस गया इस कदर,
रात भर ख्वाब से वो गुजरता रहा।