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Saturday, 20 September 2014

चाँद

चाँद,
'तुम' यूँ मुस्कुराते हुए,
जब रात की देहरी पर
लिख देते हो 'प्रेम'
मैं मोहित हो जाती हूँ,
भूल जाती हूँ
अपनी 'परिधि'
तुम हो जाते हो 'सर्वस्व',
लेकिन तुम्हे चाह लेना
ही तो 'जिंदगी' नहीं न,
तुम 'आकर्षण' हो,
'दुनिया' नहीं न,
'सुनो'
तुम बार - बार
मत लिखा करो
'प्रेम'
!!अनुश्री!!


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