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Sunday, 11 May 2014

"माँ"

"माँ"
'कैसी हो तुम?'
'उम्मीद है, अच्छी होगी।'
यही दो - चार जुमले,
जो हर ख़त में लिखती हूँ मैं,
ये जानते हुए भी 'माँ'
कि अब 'तुम्हारा' शरीर
तुम्हारा साथ नहीं देता,
उम्र जो हो चली है,

जर्जर होती देह के साथ,
मन भी टूटता जा रहा,
और फिर
'पापा' भी तो नहीं हैं,
एक औरत के लिए,
इससे बड़ा घाव
कहाँ होता है 'कोई',

जानती हूँ,
रोती होगी, हर रात,
तकिये में मूँह छिपा कर,
भुगतती होगी,
अपना अकेलापन,
भरे पुरे परिवार
के बीच भी,

हर बार की तरह,
इस बार भी पड़ी होगी,
भीषण ठण्ड, 'पर',
ये ठंडी हवाएं भी,
नहीं सुखा पायी होंगी,
'तुम्हारी' आँखों का गीलापन,
'शॉल' हाथों में लिए,
इंतजार करती होगी,
कोई कहे 'तो,
'शॉल ओढ़ लो,
कान ढँक लो,
वर्ना ठण्ड लग जायेगी !!'
'और' रो पड़ती होगी,
ज़ार जार,

सब जानती हूँ मैं 'माँ',
लेकिन नहीं चाहती,
कि तुम्हारे जख्म कुरेद कर,
तुम्हे दुःख पहुँचाऊँ,
पल - पल 'तुम्हे'
तुम्हारी कमजोरी,
तुम्हारे अकेलेपन का
एहसास कराऊँ,

इसलिए माँ,
'सिर्फ' इसलिए,
अपने हर ख़त में
लिखती हूँ 'मैं',
"कैसी हो माँ ?
उम्मीद है, अच्छी होगी। "

!!अनुश्री!!

2 comments:

  1. बहुत मार्मिक ....

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  2. कित्नों के ही मन के दर्द को लिखा है आपने ...
    पर माँ फिर भी संबल रखेगी ... उसकी संतान आये न आये ...

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