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Thursday, 28 May 2015

'चाँद'

'चाँद'
सच बताना,
बूढ़े बरगद के नीचे बैठे,
उस जादुगर से
तुमने भी सीख ली है न
'सम्मोहन विद्या' ,
हर सुबह कसम लेती हूँ,
आज तुम्हें निहारना ही नहीं है,
तुमसे बात ही नहीं करनी,
लेकिन शाम ढलते-ढलते,
स्वयं ही तोड़ देती हूँ कसम,
और तुम्हारे संग मिल कर
'मैं' भी हो जाती हूँ 'तुम'
'चाँद'
तुम ये जादुगरी
छोड़ क्यु नहीं  देते ? !!अनुश्री!!

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