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Tuesday, 7 July 2015

जाविदां

मेरी यादों की बारिश में
भींगते वक़्त,
तुम्हारा सिन्दूर हुआ मन,
भिगो देता है मेरा 'अंतर्मन',
करवाचौथ का वो चाँद,
आजकल मेरे आस-पास ही है,
लेकिन आज पहले
'तुम' हो, फिर 'वो' ,
इक 'काश' लिए
निहारती हूँ तुम्हें,
वक़्त - बेवक़्त।
तकिये के गिलाफ़ में
सहेज रखा है 'प्रेम' कि
जी सकूँ तुममे सिमट कर,
'सुनो',
मैं जुदा नहीं, जाविदां हूँ ......


इश्क़ में मेरी चुनर रंग दे, पगली हो जाऊँ,
या मीरा सी फितरत कर दे, कमली हो जाऊँ !!अनुश्री!!

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