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Thursday, 9 July 2015

अधूरापन



अग्नि के समक्ष
हाथ थामते वक़्त
थाम लिया था हमने,
एक - दूसरे का
अधूरापन,
पूर्ण हो गयी थी 'मैं',
पूर्ण हो गए थे 'तुम' भी,
तुममें उतर कर, 
लौटंना 
मुमकिन ही नहीं रहा  कभी!!अनुश्री!!







4 comments:

  1. बहुत सुन्दर !
    आभार !

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  2. मेरे ब्लॉग पे आपका स्वागत है !

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  3. बहुत शानदार और सशक्त रचना .

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