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Sunday, 19 April 2015

खामोश मोहब्बत

मोहब्बत 
को 
लफ्जों की गरज नहीं होती, 
प्रेम पत्र की 
दरकार नहीं होती, 
एक हल्की सी नजर, 
कह जाती है सैकड़ों अफ़साने, 
'पर' 
नजरों को पढने का हुनर भी 
सबको कहाँ आता है भला ? 
तुम सबसे अनोखे हो, 
पढ़ लेते हो 
मेरी हर अनकही, 
मेरी हर नजर, 
और बुन लेते हो 
कितनी ही कहानियां, 
हमें संग पिरो कर !!अनुश्री!!

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