Tuesday, 28 July 2015

चुटकी भर याद

कितना कुछ
बह गया इन दिनों
तुम्हारे 'हिस्से' का,
सारा 'प्रेम',
सारी 'चाहत',
सारी 'संवेदना',
बहा दिया, 'तुम्हें भी',
पूरा का पूरा,



चुटकी भर याद तक
नहीं रखी,
रह गया बस,
खाली 'मन',
खाली 'जीवन' !!अनुश्री!!

Sunday, 19 July 2015

तुम्हारा 'अक्स

हाँ, यही,
यही तो है,
जो सोचती हूँ मैं  भी,
कहीं कोई नहीं मेरा,
कहीं किसी की नहीं हूँ मैं
रत्ती भर भी नहीं,
व्यर्थ है तलाशना,
वक़्त को बाँधना,
बदल दी है सोच,
खोल दी मुट्ठी,
जिस्मों के रिश्ते
उम्र ले कर आते होंगे,
'मन' नहीं आता,
'परिधि' में बंध कर,
और चाँद तो हमेशा से मेरा है,
मेरे साथ, मेरे पास,
तुम्हारा 'अक्स',
तुम्हें 'खो' देने का एहसास
नहीं होता अब,
कि 'तुम' धड़कन हो,
रूह  हो,
हमेशा ही,
मेरे संग संग   !!अनुश्री!!

Wednesday, 15 July 2015

कविता आँगन से

बहुत मुश्किल होता है
खुद को मसरूफ दिखाना,
ये जताना
कि जाओ
तुम्हें नहीं तो मुझे भी नहीं है
तुम्हारी परवाह,
खारिज करती हूँ
तुम्हारा यादों में होना,
मुश्किल होता है,
बुहारे हुए घर को
फिर बुहारना,
धुले बर्तन ढूंढ - ढूंढ कर
दुबारा धुलना,
याद कर - कर के
काम निकालना,
कि निकल सको 'तुम'
जेहन से बाहर,
हाँ, सच में,
बहुत मुश्किल होता है,
आइना देखते वक़्त
खुद से ही नजरें चुराना,
कहीं नजरों ने नजरों  की
चोरी पकड़ ली, तो?
'तुम' भी न, अजब हो,
जाने कैसे पैठ बना लेते हो,
बंद दरवाजे भीतर भी !!अनुश्री!! 

Thursday, 9 July 2015

अधूरापन

अग्नि के समक्ष
हाथ थामते वक़्त
थाम लिया था हमने,
एक - दूसरे का
अधूरापन,
पूर्ण हो गयी थी 'मैं',
पूर्ण हो गए थे 'तुम' भी, 
तुममें उतर कर,
लौटंना
मुमकिन ही नहीं रहा कभी!!अनुश्री!!






Tuesday, 7 July 2015

जाविदां

मेरी यादों की बारिश में
भींगते वक़्त,
तुम्हारा सिन्दूर हुआ मन,
भिगो देता है मेरा 'अंतर्मन',
करवाचौथ का वो चाँद,
आजकल मेरे आस-पास ही है,
लेकिन आज पहले
'तुम' हो, फिर 'वो' ,
इक 'काश' लिए
निहारती हूँ तुम्हें,
वक़्त - बेवक़्त।
तकिये के गिलाफ़ में
सहेज रखा है 'प्रेम' कि
जी सकूँ तुममे सिमट कर,
'सुनो',
मैं जुदा नहीं, जाविदां हूँ ......


इश्क़ में मेरी चुनर रंग दे, पगली हो जाऊँ,
या मीरा सी फितरत कर दे, कमली हो जाऊँ !!अनुश्री!!

Monday, 29 June 2015

'मृगतृष्णा'

जाने कितने ही नक्षत्रों, 
आकाशगंगाओं को लाँघ कर, 
लौट आता है 'मन'
'तुम' तक, बार- बार,  
ये जानते हुए कि 
तुम्हारी आस, 
इक प्यास है, 
चिरस्थायी प्यास, 
आह! जीवन है, 
तुम्हारे और मेरे प्रेम की 
'मृगतृष्णा', 
हाँ, जादूगर हो 
'स्वामी' 'तुम' !!अनुश्री!!

Friday, 26 June 2015

बलात्कार

बालात्कार  से पीड़ित लड़कियाँ,
बचाये रखना चाहती हैं
अपनी जिजीविषा,
फूँक देना चाहती हैं,
स्याह  अतीत,
मन की पीड़ा,
कौमार्य की टूटन,
तार हुए दामन का
एक - एक टुकड़ा।
छटपटाती हैं कि निकल जायें
जिस्म के लिजलीजेपन  से बाहर,
धुल लेना चाहती हैं 'मन'
कई - कई बार नहा कर।
जाने कितनी ही बार सिलती हैं
'मन',
परन्तु अखबार की  एक खबर
 'बलात्कार',
उधेड़ कर  रख देती है सारी सीलन।
रिसने लगता है रक्त।
पागलों की तरह नोचती हैं
अपना ही जिस्म,
एक - एक छुवन
नोच फेंक देना चाहती हों जैसे।
वक़्त के चाँटे
सूखने नहीं देते आँसू,
उगने नहीं देते मुस्कान।
जिस्म का जख्म
एक - एक कर भर भी जाये तो क्या,
 कैक्टस की तरह फैलते हैं
'मन' के जख्म।
वक़्त और समाज इन्हें भरने नहीं देता,
बल्कि खुरच - खुरच कर
बना देता है 'नासूर' !!अनुश्री!! 

साथ

उन दिनों जब सबसे ज्यादा जरूरत थी मुझे तुम्हारी तुमने ये कहते हुए हाथ छोड़ दिया कि तुम एक कुशल तैराक हो डूबना तुम्हारी फितरत में नहीं, का...