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Tuesday, 2 April 2013

माला


'मैं'
नहीं देखती,
अपनी कविता में,
मात्रा, लय, छंद ,
पिरो देती हूँ
अपने मन के भाव
एक धागे में,
गूँथ लेती हूँ
'माला' शब्दों की,
मालाएं भी
अजीबो गरीब तरह की,
कोई ताजे  फूल का,
तो कोई उदास उदास सा ,
कोई सुर्ख लाल रंग का,
तो कोई उड़ी  से रंगत लिए,
कभी दर्द से उफनते सागर में
डूब जाते हैं शब्द,
तो कभी हंसी और खुशियों की
बौछार दे जाते हैं,
कभी कभी तो
चांदनी की सारी रोमानियत
समेट  लेते हैं,
और कभी बस
लिख देती हूँ 'मन'
'तुम्हें'
मन का लिखा,
पढना तो आता है 'न' ... !!अनुश्री!!

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