Saturday, 19 August 2017

तुम्हारा लौटना

तुम्हारा लौटना
यूँ कि जैसे
बहार उतर आई हो
आंगन में,
यूँ कि जैसे
गुलमोहर
खिलखिला पड़े हों,
तुम्हारे बाद
हाथ छुड़ा गयी थीं
प्रेम कवितायें,
गुम हो गए थे
जज़्बात,
तुम्हारा लौटना,
जैसे कि
जिन्दगी लौट आई ...!!अनुश्री!!

Saturday, 7 January 2017

प्रेम का गणित

(1)

मैं
नकारती हूँ,
देह, आँखें, दिल और
प्यार की दुनिया,
स्वीकारती हूँ,
धुंध, सपने,
जिस्मों के उस पार
की दुनिया..... !!अनुश्री!!


(2)
वो पढ़ रही है,
प्रेम का गणित,
उसके अनगिनत कोण,
उसने पढ़ा कि
प्रेम नहीं रहता,
एक बिंदु पर
टिक कर कभी,
बदलता रहता है
स्वरूप,
उसने पढ़ा कि
दो समान्तर रेखायें
जुड़ कर
बदल सकती हैं एक रेखा में,
परन्तु
त्रिकोण नहीं हो सकते एक,
इन दिनों वो
लिख रही है
उदासी ..... !!अनुश्री!!


(3)
उसने कहा
'खुद को मेरी नजर से देखो'
वो शामिल हो गयी
दुनिया की सबसे
खूबसूरत औरतों में,
इन दिनों उसे
दिखने लगे हैं
अपने चेहरे पर उगे
तमाम तिल,
हज़ारों निशान...!!अनुश्री!!


Friday, 23 December 2016

प्रेम राग

प्रेम,
कभी -कभी
भ्रम में होना भी,
कितना सुकून देता हैं न,
और वो भी
तुम्हारे होने के भ्रम से
ज्यादा खूबसूरत
क्या होगा भला,
इधर,
वो हार जाना चाहती है, दुःख,
उधर,
दर्द जीत लेना चाहता है उसे,
तुमने कहा,
तुम लौट जाना चाहते हो,
अपने ख़्वाहिशों के गाँव,
बुनना चाहते हो
एक रंगीन सपना,
तुम्हें पता है,
उसे सपने नहीं आते अब,
उसने सपनों की जगह
जड़ लिया है तुम्हें,
अपने भ्रम जाल से
बाहर निकलना
सीखा ही नहीं उसने,
सुनो,
वो भी गुनगुनाना चाहती है,
नदी गीत,
लिखना चाहती है,
प्रेम राग.... !!अनुश्री!!

Saturday, 23 April 2016

मुझमें 'तुम'

तुम समेट लेना चाहते थे,
मुझमें से 'तुम',
परन्तु
तमाम प्रयासों के बाद भी,
शेष रह गया,
थोड़ा सा अहसास,
आकाश भर प्रेम,
अंजुरी भर याद,
चाँद भर स्नेह,
काँधे का तिल,
तुम्हारी देह गंध,
या यूँ कहूँ,
नहीं निकाल पाए तुम,
मुझमें से 'तुम' !!अनुश्री!!

Wednesday, 24 February 2016

प्रेम

स्वयं को बार-बार
साबित करता प्रेम
साबित नहीं हुआ कभी,
और यकीं की दिवार पर
खड़ा प्रेम,
लड़खड़ाया नहीं कभी,
दूर कहीं नीरो की बाँसुरी
आवाज़ लगाती हुईं,
बेसुध हुआ मन,
बह जाना चाहता है,
उन स्वर लहरियों के साथ ही,
देह जड़ हो गयी है,
किसी पत्थर की मानिंद,
कितना आकर्षक है,
क्लियोपैट्रा के होठों का नीला रंग,
जिन्दगी डूब जाना चाहती है,
उस नीले रंग में,
नीला आसमान, नीली जमीं,
और नीली ही मैं ,
सुनता कौन है,
टूटती जिन्दगी की
खामोश चीखें..... !!अनुश्री!!

Wednesday, 3 February 2016

जिन्दगी

तुम्हारी कलाई पर
मौली बाँध,
बाँध  आना था,
तुम्हारी सारी मुश्किलें,
सारी
बुरी नजरों की कालिख,
जटाधारी के समक्ष
शीश नवाते वक़्त,
आशीष में
तुम्हारे लिए माँग लेना चाहिए था,
इंद्रधनुषी रंग,
नदिया की बहती जलधारा में
बहा देनी थी सारी पीड़ा,
सारे क्लेश,
उन तमाम पत्थरों के बीच,
बना देनी थी,
तुम्हारे राह के
पत्थरों की समाधि
काश कि
लौटा लाती तुम तक,
तुम्हारे बीते हुए दिन,
जिन्दगी... !!अनुश्री!!

साथ

उन दिनों जब सबसे ज्यादा जरूरत थी मुझे तुम्हारी तुमने ये कहते हुए हाथ छोड़ दिया कि तुम एक कुशल तैराक हो डूबना तुम्हारी फितरत में नहीं, का...