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Wednesday, 3 February 2016

जिन्दगी

तुम्हारी कलाई पर
मौली बाँध,
बाँध  आना था,
तुम्हारी सारी मुश्किलें,
सारी
बुरी नजरों की कालिख,
जटाधारी के समक्ष
शीश नवाते वक़्त,
आशीष में
तुम्हारे लिए माँग लेना चाहिए था,
इंद्रधनुषी रंग,
नदिया की बहती जलधारा में
बहा देनी थी सारी पीड़ा,
सारे क्लेश,
उन तमाम पत्थरों के बीच,
बना देनी थी,
तुम्हारे राह के
पत्थरों की समाधि
काश कि
लौटा लाती तुम तक,
तुम्हारे बीते हुए दिन,
जिन्दगी... !!अनुश्री!!

4 comments:

  1. अजनबी होकर भी क्यों न हो अजनबी तुम
    घर कर जाते हो तुम मिश्री के जैसे बन फिर
    छूट नहीं पाते चाहे जितने भी कर लो जतन
    प्रेम की बगिया के फूलों की महक
    सच कहीं दूर जा पाती भी तो नहीं
    बसेरा डाल वो साथ साथ चलती है..!!

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  2. जो भी उमड़ता घुमड़ता रहता तुम्हारे आस पास
    कभी चिट्ठी बनकर नहीं पहुँच पाया तुम्हारे पास
    कोई अड़चन भी तो नहीं थी पर थामे थे डर
    ना जाने कितने अजूबे से वो भी घुमड़ते थे
    बादलों की तरह बहते आते जाते बरस न पाते
    हवाओं ने शायद बांध रखी थी मन की डोर
    फिर भी यह था कि शब्दों के सागर को
    नहीं थी बूंदों की जरुरत,वह भरा पूरा था
    उसे मालूम थी हर बून्द की शरारत
    कि कैसे वह वक्त बेवक्त लबालब
    कर जाया करती है और तृप्त..!!

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