Wednesday, 10 April 2013

कविता बनती है तब .

न जाने क्यूँ ,
कविता बनती है तब .
जब मन होता है 
टूट कर बिखरा हुआ, 
सोई होती है इच्छाएं, 
अरमान रो रो कर 
हलकान हुए जाते हैं, 
और जब दर्द की अधिकता से 
मन का पोर पोर दुखता है, 
रह रह कर यादों की 
उबासी घेर लेती है,
जिन्दगी भी न, 
दर्द और यादों से अलग 
कुछ भी नहीं, 
कुछ देर को तो 
इधर उधर घुमती है, 
फिर लौट आती है, 
इसी की छत्रछाया में। 
उन यादों से रुदन से 
कभी कभी संगीत की 
स्वरलहरी फूट पड़ती है, 
दर्द में डूबे, 
आँसुओं से सराबोर स्वर, 
जो पिघला देते हैं पहाड़, 
बहा देते हैं दरिया, 
जाने क्यों, 
कविता बनती है तब .. !!ANU!!

Tuesday, 9 April 2013

मुक्तक


शोहरतों पर गुरुर, मत करना,
अपनी नजरों से दूर, मत करना,
प्यार में तेरे, जाँ से जाऊं मैं,
जुल्म ऐसा हुजूर, मत करना .. !!अनु!!

Monday, 8 April 2013

'वो'

'वो' 
उसका आखिरी गीत था, 
कल से उसे 
अपने पंखों को विराम देना था, 
अपने सपनो की 
रफ़्तार रोकनी थी, 
'शायद' 
तैयार नहीं थी 'वो' 
उसके लिए, 
'गीत' 
तो उसकी रूह में बसते थे, 
थरथराते होठों,
पनीली आँखों
और रुंधे गले से गाये गीत
वो छाप न छोड़ सके
जो अमूनन उसके गीत छोड़ते थे,
वो गाती जा रही थी,
अपनी ही रौ में,
'बेपरवाह'
उसे पता ही नहीं चला,
'कब'
उसके गीतों का दर्द
उसकी आँखों में उतर आया,
तेजी से आंसुओं को
पलकों में भींच लिया उसने
और होठों पर सजा ली,
एक प्यारी सी मुस्कान ..
मगर,
बेहिसाब कोशिशों के बाद भी,
उसके अश्क पलकों पर ठहर न सके,
छलक ही पड़े,
उसकी आवाज़ गले में ही
घुट कर रह गयी,
'और' वो गीत सचमुच बन गया
उसके जीवन का 'आखिरी गीत' !!ANU!! ....

Sunday, 7 April 2013

सपना

खुश थी वो
खुद को चारदीवारी में बांध कर,
तभी एक सपने ने
सांकल खट्काई,
उसके आकर्षण से वशीभूत 'वो'
चल दी 'सपने' के पीछे पीछे,
किसी ने उसे नहीं रोका,
किसी ने टोका भी नहीं,
'वो' चलती रही, चलती रही,
अब उसे भी 'सपने' का साथ
भाने लगा था,
तभी किसी ने पीछे से,
कस कर पकड़ लिया, 'उसका हाथ'
पीछे जो मुड़  कर देखा
'तो वो' हकीकत थी,
वो फिर पलटी,
उसका सपना दूर,
' बहुत दूर'
जा चूका था ...



Friday, 5 April 2013

'वो' लड़की,




'वो' लड़की,
सपनों के झूले में बैठ, 
बादलों के पार जाती है, 
हवा से बातें करती, 
इन्द्रधनुष के रंग चुराती,
ऊँचाइयों को छूती, 
ख़ुशी से फूली नहीं समा रही थी, 
'अचानक' 
टूट जाता है झुला, 
गिर जाती है वो, 
हकीकत की पथरीली जमीं पर,
नजर उठा कर उपर
देखने को कोशिश जो की ..
'तो देखा' ,
वो ऊंचाइयां,
वो हवाएं,
वो इन्द्रधनुष,
सब हंस रहे थे उस पर,
जैसे कह रहे हों,
'हमें छू लेना, इतना आसान नहीं' .. !!अनु!!

Thursday, 4 April 2013

कहीं ऐसा न हो जाये कभी,

कहीं ऐसा न हो जाये कभी, 
कि मेरी सहनशक्ति 
अपने तटबंधों को तोड़, 
पुरे रफ़्तार से
किनारे से टकरा जाये 
आ जाये तूफ़ान, 
मच जाये हाहाकार ... 

कहीं ऐसा न हो जाये कभी, 
कि वर्षों से सुषुप्त ज्वालामुखी, 
सह न सके भावनाओं का वेग
और फूट जाये,
बह उठे ज्वार भावनाओं का,
बहा ले जाये,
'घर' 'परिवार' ...

मुझे रहने दो मेरी
सीप के अन्दर,
उकसाओ मत .. !! अनु!!

Tuesday, 2 April 2013

माला


'मैं'
नहीं देखती,
अपनी कविता में,
मात्रा, लय, छंद ,
पिरो देती हूँ
अपने मन के भाव
एक धागे में,
गूँथ लेती हूँ
'माला' शब्दों की,
मालाएं भी
अजीबो गरीब तरह की,
कोई ताजे  फूल का,
तो कोई उदास उदास सा ,
कोई सुर्ख लाल रंग का,
तो कोई उड़ी  से रंगत लिए,
कभी दर्द से उफनते सागर में
डूब जाते हैं शब्द,
तो कभी हंसी और खुशियों की
बौछार दे जाते हैं,
कभी कभी तो
चांदनी की सारी रोमानियत
समेट  लेते हैं,
और कभी बस
लिख देती हूँ 'मन'
'तुम्हें'
मन का लिखा,
पढना तो आता है 'न' ... !!अनुश्री!!

साथ

उन दिनों जब सबसे ज्यादा जरूरत थी मुझे तुम्हारी तुमने ये कहते हुए हाथ छोड़ दिया कि तुम एक कुशल तैराक हो डूबना तुम्हारी फितरत में नहीं, का...