
हमेशा से
'तुम्हारे '
लौटने की राह देखी,
वो चिराग 'जो' जलता छोड़ गए थे तुम..
ये कह कर कि
'इस दिए कि लौ बुझने से पहले मैं लौट आऊंगा'
'मैंने'
उस चिराग कि लौ को कम नहीं होने दिया,
रोज़ उस दिए में तेल डालती रही,
बुझने नहीं दिया 'मैंने', तुम्हारे आस का दिया...
वक्त बीतता गया, लम्हे सालों में बदलने लगे,
सब कुछ तो बदल गया है,
अब 'मैं' ब्याहता हूँ, किसी और की,
'फिर भी' न जाने क्यों,
उस दिए की लौ को बुझने नहीं दिया मैंने,
लेकिन इधर कुछ दिनों से,
'मन' डगमगाने लगा है,
कुछ- कुछ आस भी टूटने लगी है..
और 'अब'
अब, अगर तुम लौट भी आये 'तो क्या'..?
'तो क्या'
ReplyDeleteअद्भुद उलाहना.
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