Saturday, 29 December 2012

'दामिनी'



'दामिनी'
'तुम' चली गयी,
जाना ही था तुम्हे,
रुक भी जाती तो क्या?
कहाँ जी पाती 'तुम'
अपनी जिंदगी 'फिर से' ,
कहाँ से लाती जीने की
वही चाह,
वही उमंग,
और सच कहूँ न ,
तो तुम्हारी मौत का मातम मनाता,
रोता पीटता ये समाज ही
तुम्हे जीने नहीं देता,
हर औरत के लिए तुम
'बेहया'
से ज्यादा कुछ नहीं होती,
और मर्दों का कहना ही क्या
'उन्हें तो एक नया मसाला मिल जाता,
जिस पर वो रिसर्च करते'
इससे ज्यादा कुछ भी नहीं होना था तुम्हारा,
तुम्हारा मुस्कुराना, हँसना ,
खिलखिलाना सब
खटकता लोगों को,
तब यही लोग तुम्हे
'बदचलन' का तमगा देते,
कहाँ निकल पाती
'तुम'
अपने जिस्म के लिजलीजेपन से बाहर,
या यूँ कहूँ की कहाँ निकलने देता
कोई तुम्हे तुम्हारे अतीत से बाहर,
कौन बनता तुम्हारी राह का 'हमसफ़र',
कोई नहीं,
'कोई भी नहीं',
माना की ये आंसू सच्चे हैं,
लेकिन ये तुम्हारी 'मौत' के आंसूं हैं,
तुम्हारे 'जिन्दा न रहने' के नहीं ...

!!अनु!!

Thursday, 13 December 2012

इक लम्बा अन्तराल तुमसे मिलना पहली बार !!

इक  लम्बा अन्तराल
तुमसे मिलना पहली बार !

'गुजरे'
उन तमाम वर्षों में
कभी याद नहीं किया तुम्हे
याद रहा तो बस इतना  ही
कि  तुम्हे याद नहीं मैं
तुम्हारे किसी एहसास
किसी भाव में नहीं मैं,  
तब भी  लिखना चाहती  थी
तुम पर,
अजीब विडम्बना है न,
जब तुम थे तब शब्द नहीं थे,
'और  आज'
जब शब्द हैं तो तुम नहीं हो,
जीवन  तब भी था , जीवन अब भी है,
'पर जिंदगी'
जिंदगी नहीं,  
सूरज का निकलना,
उसका डूबना,
बदस्तूर जारी है,
'गर नहीं है' तो किसी 'सहर'
किसी 'शाम' में 'तू नहीं है',
वक़्त के साथ धुंधलाती तस्वीरों में,
 'तुम्हारी तस्वीर'
'आज भी'
साफ़ साफ़ दिखाई पड़ती है मुझे
हवाओं का फुसफुसाना ,
फूलों का खिलखिलाना
अब भी सुनाई पड़ती हैं मुझे ,
'सोचा था एक बार',
भ्रम हो शायद ,
टूट जायेगा,
लेकिन जाने क्यों, होता है ये हर बार ,
'बार - बार' ..
इक  लम्बा अन्तराल, तुमसे मिलना पहली बार !

Saturday, 8 December 2012

'स्त्री'

अस्मत जो लुटी तो तुझको 
बेहया कहा गया, 
मर्जी से बिकी तो नाम 
वेश्या रखा गया,

हर बार सलीब पर, 
औरत को  धरा गया ...

बेटे के स्थान पर,
जब जन्मी है बेटी, 
या फिर औलाद बिन, 
सुनी हो तेरी  गोदी, 
कदम कदम पर अपशकुनी 
और बाँझ कहा गया, 




जब भी तेरा दामन फैला, 
घर के दाग छुपाने को ,
जब भी तुमने त्याग किये थे ,
हर दिल में बस जाने को, 
इक इक प्यार और त्याग 
को 'फ़र्ज़' कहा गया,  


पंख  पसारे आसमान को, 
जब जब छूना चाहा, 
रंग बिरंगे सपनों को, 
हकीकत करना  चाहा
तू अबला है तेरी क्या, 
औकात कहा गया ...
हर बार सलीब पर, 
औरत को  धरा गया ...




Saturday, 27 October 2012

भोजपुरी गीत

बहा त पिरितिया के, फिर से बयार हो,
जबसे हैं अईले सांवर, बलमु  हमार हो।

नाही चाही चूड़ी हमके, नहीं चाही कंगना,
तुही बाटा  बिछुआ, पायल, तुही श्रंगार हो।.

जबसे तू गईला हमके, छोड़ी के विदेशवा,
सूना पड़ल साजन, अंगना दुआर हो।.

केकरा से हाल कहती, केसे दिल के बतिया,
भावे नाही गाँव, टोला, नाही संसार हो।.!!अनुश्री!!


Sunday, 21 October 2012

दुर्गा पूजा

आज दुर्गा अस्टमी है, हम लोग हर साल..इसी दिन घुमने जाते.. नवमी को इसलिए नहीं जाते थे, क्यूँ की उस दिन भीड़ बहुत होता था, और सप्तमी को कम भीड़ की वजह से घुमने का मजा नहीं आता था।

ठीक नौ बजे रात में निकलते थे, माँ, पापा, दीदी, भैया, हम और गुड्डू (छोटा भाई), वैसे तो घर में कार नहीं था, लेकिन मेरे पापा, सुपर पापा थे, बिना बताये पहले से बुक करा के रखते थे। और कपडा, 'हाँ' कपडा तो दू गो चाहिए होता था, एक गो में काम कहाँ चलता। जो कपडा पहिन के दुर्गा पूजा देखते थे, उसी को पहन के दशहरा, कभी नहीं। अईसा तो होईए नहीं सकता था। कोई सहेली या कोई जान पहचान का दुनो दिन मिल गया तो, केतना बेइज्जती हो जाता। आराम से रात में निकलते, धुर्वा, डोरंडा, और नामकुम घूम कर फिर रांची का देखते थे। फिर आखिर में खा - पी कर घर। (उस दिन घर में रात का खाना नहीं बनता था)
आज उ दिन भी नहीं है, पापा भी नहीं है, और न ही पूजा में घुमने का पहले जैसा जोश। सब कुछ बदल गया।

(कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन)

Tuesday, 9 October 2012

गीत

मेरी हर बात को जब हंस के उड़ा देते हो
है क़सम जान,,, मेरी .जान जला देते हो ...


अजब है तेरा, मेरे ख्वाब में आना जालिम,
चाँद को जलता, आफताब बना देते हो..


कभी गिरे जो मेरे अश्क, तेरे हाथों पर,
आब-ए -चश्म* को, नायाब बना देते हो,


उतर के आते हो, जब तुम 'अनु' की आँखों में,
जिंदगी को हसीन,  ख्वाब बना देते हो...



*आँसू 

साथ

उन दिनों जब सबसे ज्यादा जरूरत थी मुझे तुम्हारी तुमने ये कहते हुए हाथ छोड़ दिया कि तुम एक कुशल तैराक हो डूबना तुम्हारी फितरत में नहीं, का...