Sunday, 16 February 2014

कविता - रसोई से

कविता - रसोई से 

'जिंदगी'
तू क्यूँ नहीं हो जाती,
उस बासी रोटी के समान,
जिसे तवे पर रख,
दोनों तरफ से घी चुपड़,
छिड़क कर थोड़ा सा नमक,
तैयार कर लेती,
कुरकुरी और चटपटी
सी 'जिंदगी'
या फिर,
उसके छोटे छोटे टुकड़े कर,
छौंक देती कढ़ाही में,
ऊपर से डालती,
दूध और शक्कर,
और जी भर उठाती,
प्रेम और अपनेपन
से सजी,
'जिंदगी' के मजे। .!!अनु!!

Tuesday, 4 February 2014

बसंत

'लो'
फिर आ गया बसन्त,
प्रेम का उन्माद लिए,
प्रियतम की याद लिए,

'बसन्त' तो मेरे
मन का भी था,
रह गया उम्र के
उसी मोड़ पर,
लौटा ही नहीं,
जिंदगी उस
फफोले की मानिंद है,
जो रिसता  है
आहिस्ता आहिस्ता,
बेइंतहां दर्द के साथ,
परन्तु सूखता नहीं,

नहीं खिलता
मेरे चेहरे पर,
सरसों के फूल का
पीला रंग,
पलाश के फूल
हर बार की तरह
इस बार भी
मुझे रिझाने में
नाकामयाब रहे,

तुम्हारी यादों के
चंद आँसूं,
पलकों पर सजा
'कभी कभी'
इतरा लेती हूँ
'मैं भी'

ओ मेरे जीवन के श्रृंगार,
मेरे पहले प्यार,
'तुम' आओ
तो बसंत आये। .!!अनु!!


Friday, 31 January 2014

ज्वालामुखी

पनपता है 'दिल में', 
इक 'जिन्दा' ज्वालामुखी, 
भावनाओं का वेग, 
पूरे उफ़ान पर, 
'फट' पड़ने को आतुर, 

जानती हूँ, 
फटने से 
दरक जायेंगे 
'रिश्ते' 
टूट जायेंगे, 
'बंधन' 
और 'नारीत्व' 
तोड़ने में नहीं 
जोड़ने में है, 
रख देती हूँ, 
'मुहाने' पर, 
झूठी 'आशाओं', 
'उम्मीदों' 
और 'दिलासाओं' 
का पत्थर, 
ताकि, 
घुट कर रह जाएँ, 
'सिसकियाँ' 
सूख जाएँ 'आँसूं' 
हसरतें तोड़ दे 'दम' 
'जिन्दा' ज्वालामुखी 
हो जाये, 
'सुप्त' 'इसका' 
मृतप्राय हो जाना, 
नहीं है, 
'मेरे बस में' । !!अनु!!

Tuesday, 28 January 2014

नहीं 'छलकता'

नहीं 'छलकता', 
मेरी आँखों से 
खारे जल का 
एक भी कतरा, 
'माँ ने' घुट्टी में, 
पिलाई है, 
दर्द को जब्त 
करने 
की कला, 

'दिल' के घाव,
रिसते हैं,
भीतर ही भीतर,
खून का पानी हो जाना,
बदस्तूर जारी है,
ये अब जुल्म पर
उबलता ही नहीं,
ग़म में पलकों से,
बहता भी नहीं,

'जानती हूँ',
नम आँखों के साथ,
होठों पर मुस्कान,
सजाये रखने की कला,
होठों को भींच कर,
चीखों को गले में ही,
घोंट लेने की कला,
आखिर,
माँ ने जो सिखाई है,
दर्द को जब्त
करने
की कला। .!!अनु!!

Tuesday, 14 January 2014

सरस्वती वंदना

हे हंसवाहिनी, हे शारदे माँ,
विद्या का तू उपहार दे माँ,
जीवन पथ पर बढ़ती जाऊँ,
अपनों का विश्वास बनूँ माँ,
अंधियारे को दूर भगा दूँ,
ऐसी तेरी दास बनूँ माँ,
तेरी महिमा जग में गाउँ ,
अधरों को तू उदगार दे माँ,
हे हंसवाहिनी, हे शारदे माँ,
विद्या का तू उपहार दे माँ,
मधु का स्वाद लिए है ज्यो अब,
विष का भी मैं पान करूँ माँ,
फूलों पर जैसे चलती हूँ,
शूलों को भी पार करूँ माँ,
तूफानों में राह बना लूँ,
ज्ञान का तू भण्डार दे माँ ,
हे हंसवाहिनी, हे शारदे माँ,
विद्या का तू उपहार दे माँ.. 

Monday, 13 January 2014

'मुझ पर'

'मुझ पर' 
नहीं लिखी जा सकती, 
कोई 'प्रेम'
कविता, 
नहीं लिखे जा सकते हैं 
गीत, 
'मैं' नहीं उतरती,
सुंदरता के मानकों
पर खरी,
जिसमे निहायत ही जरुरी है,
चेहरे पर 'नमक' का होना,
'जरुरी है', आँखों में
शराब की मस्ती,
'और' इससे भी जरुरी है,
'जिस्म' का सांचे में ढला होना,
'मुझ पर तो'
कसी जाती हैं फब्तियां,
लिखा जाता है व्यंग,
जिस्मों को पढ़ती,
उन पर गीत लिखती 'नजरें'
क्यूँ नहीं पढ़ पाती,
आत्मा की चीत्कार,
'उनकी वेदना',
'क्यूँ' तन की सुंदरता
भारी पड़ जाती है,
मन की सुंदरता पर ??? !!अनु!!

Friday, 3 January 2014

ग़ज़ल

लम्हा लम्हा ये मन यूँ पिघलता रहा,
उसके सीने में दिल बन धड़कता रहा।

उसकी चाहत की खुश्बू हवा बन गयी,
सुबह से शाम तक वो महकता रहा।

तेरे जाने का ये दिल पे आलम रहा,
रात रोती रही दिन सिसकता रहा।

उनके पहलु में देखा किसी और को,
शमा बेदम हुई दिल सुलगता रहा।

मेरी नजरों में वो बस गया इस कदर,
रात भर ख्वाब से वो गुजरता रहा।  

साथ

उन दिनों जब सबसे ज्यादा जरूरत थी मुझे तुम्हारी तुमने ये कहते हुए हाथ छोड़ दिया कि तुम एक कुशल तैराक हो डूबना तुम्हारी फितरत में नहीं, का...