Monday, 21 January 2013
'जिंदगी'
(1)
किसी टूटते दरख़्त को
देखा है कभी,
सुनी है, उसकी चीत्कार,
ऐसे ही चीत्कार उठता है
मेरा मन भी,
जब
रौंदते हो 'तुम'
मेरी 'आत्मा' ,
कुचल देते हो
मेरे 'सपने'
दर्द को होठों में भींच,
समेट लेती हूँ,
पलकों में आंसू सारे,
सजा लेती हूँ,
मुस्कान 'होठों पर' ,
तुम्हे नफरत जो है,
मेरे उदास चेहरे और
गालों पर लुढ़कते आंसुओं से .. !!अनु!!
(2)
'जिंदगी'
इम्तिहान लेती है,
फिर मिलता है,
परिणाम,
'मैं'
बगैर परिणाम की सोचे,
देती हूँ इम्तिहान,
'हर बार'
खबर है मुझे,
उसने मेरी तकदीर में,
हार और वेदना लिखी है,
अरमानों की राख लिखी है,
आशाओं की लाश लिखी है .. !!अनु!!
Friday, 11 January 2013
मीरा
'मैं'
मानती रही तुम्हे
'अपना 'प्रेम'
कन्हैया सा रूप,
मोह लेता है मन,
मुझे नहीं बनना
'राधा'
न ही लेना है स्थान,
'रुक्मणि' का,
'मैं'
मीरा सी मगन,
गरलपान कर,
तुममें मिल,
पूर्ण हो जाऊँगी .. !!अनु!!
'तुम पर'
बार - बार
नजरों का ठहर जाना,
कुरेद देता है,
कई पुराने घाव,
पुरानी यादें,
आगे बढ़ते पाँव ,
ठिठक जाते हैं,
कहीं तुम्हारी यादों पर,
कोई और रंग न चढ़ गया हो,
वैसे,
ऐसा हुआ भी न,
तो आश्चर्य नहीं होगा मुझे,
'तुम'
अब भी रहे
'उतने ही व्यावहारिक'
और 'मैं'
वैसी ही 'पगली सी' .. !!अनु!!
Saturday, 29 December 2012
'दामिनी'
'दामिनी'
'तुम' चली गयी,
जाना ही था तुम्हे,
रुक भी जाती तो क्या?
कहाँ जी पाती 'तुम'
अपनी जिंदगी 'फिर से' ,
कहाँ से लाती जीने की
वही चाह,
वही उमंग,
और सच कहूँ न ,
तो तुम्हारी मौत का मातम मनाता,
रोता पीटता ये समाज ही
तुम्हे जीने नहीं देता,
हर औरत के लिए तुम
'बेहया'
से ज्यादा कुछ नहीं होती,
और मर्दों का कहना ही क्या
'उन्हें तो एक नया मसाला मिल जाता,
जिस पर वो रिसर्च करते'
इससे ज्यादा कुछ भी नहीं होना था तुम्हारा,
तुम्हारा मुस्कुराना, हँसना ,
खिलखिलाना सब
खटकता लोगों को,
तब यही लोग तुम्हे
'बदचलन' का तमगा देते,
कहाँ निकल पाती
'तुम'
अपने जिस्म के लिजलीजेपन से बाहर,
या यूँ कहूँ की कहाँ निकलने देता
कोई तुम्हे तुम्हारे अतीत से बाहर,
कौन बनता तुम्हारी राह का 'हमसफ़र',
कोई नहीं,
'कोई भी नहीं',
माना की ये आंसू सच्चे हैं,
लेकिन ये तुम्हारी 'मौत' के आंसूं हैं,
तुम्हारे 'जिन्दा न रहने' के नहीं ...
!!अनु!!
Monday, 17 December 2012
Thursday, 13 December 2012
इक लम्बा अन्तराल तुमसे मिलना पहली बार !!
इक लम्बा अन्तराल
तुमसे मिलना पहली बार !
'गुजरे'
उन तमाम वर्षों में
कभी याद नहीं किया तुम्हे
याद रहा तो बस इतना ही
कि तुम्हे याद नहीं मैं
तुम्हारे किसी एहसास
किसी भाव में नहीं मैं,
तब भी लिखना चाहती थी
तुम पर,
अजीब विडम्बना है न,
जब तुम थे तब शब्द नहीं थे,
'और आज'
जब शब्द हैं तो तुम नहीं हो,
जीवन तब भी था , जीवन अब भी है,
'पर जिंदगी'
जिंदगी नहीं,
सूरज का निकलना,
उसका डूबना,
बदस्तूर जारी है,
'गर नहीं है' तो किसी 'सहर'
किसी 'शाम' में 'तू नहीं है',
वक़्त के साथ धुंधलाती तस्वीरों में,
'तुम्हारी तस्वीर'
'आज भी'
साफ़ साफ़ दिखाई पड़ती है मुझे
हवाओं का फुसफुसाना ,
फूलों का खिलखिलाना
अब भी सुनाई पड़ती हैं मुझे ,
'सोचा था एक बार',
भ्रम हो शायद ,
टूट जायेगा,
लेकिन जाने क्यों, होता है ये हर बार ,
'बार - बार' ..
इक लम्बा अन्तराल, तुमसे मिलना पहली बार !
तुमसे मिलना पहली बार !
'गुजरे'
उन तमाम वर्षों में
कभी याद नहीं किया तुम्हे
याद रहा तो बस इतना ही
कि तुम्हे याद नहीं मैं
तुम्हारे किसी एहसास
किसी भाव में नहीं मैं,
तब भी लिखना चाहती थी
तुम पर,
अजीब विडम्बना है न,
जब तुम थे तब शब्द नहीं थे,
'और आज'
जब शब्द हैं तो तुम नहीं हो,
जीवन तब भी था , जीवन अब भी है,
'पर जिंदगी'
जिंदगी नहीं,
सूरज का निकलना,
उसका डूबना,
बदस्तूर जारी है,
'गर नहीं है' तो किसी 'सहर'
किसी 'शाम' में 'तू नहीं है',
वक़्त के साथ धुंधलाती तस्वीरों में,
'तुम्हारी तस्वीर'
'आज भी'
साफ़ साफ़ दिखाई पड़ती है मुझे
हवाओं का फुसफुसाना ,
फूलों का खिलखिलाना
अब भी सुनाई पड़ती हैं मुझे ,
'सोचा था एक बार',
भ्रम हो शायद ,
टूट जायेगा,
लेकिन जाने क्यों, होता है ये हर बार ,
'बार - बार' ..
इक लम्बा अन्तराल, तुमसे मिलना पहली बार !
Saturday, 8 December 2012
'स्त्री'
अस्मत जो लुटी तो तुझको
बेहया कहा गया,
मर्जी से बिकी तो नाम
वेश्या रखा गया,
हर बार सलीब पर,
औरत को धरा गया ...
बेटे के स्थान पर,
जब जन्मी है बेटी,
या फिर औलाद बिन,
सुनी हो तेरी गोदी,
कदम कदम पर अपशकुनी
और बाँझ कहा गया,
जब भी तेरा दामन फैला,
घर के दाग छुपाने को ,
जब भी तुमने त्याग किये थे ,
हर दिल में बस जाने को,
इक इक प्यार और त्याग
को 'फ़र्ज़' कहा गया,
पंख पसारे आसमान को,
जब जब छूना चाहा,
रंग बिरंगे सपनों को,
हकीकत करना चाहा,
तू अबला है तेरी क्या,
औकात कहा गया ...
हर बार सलीब पर,
औरत को धरा गया ...
बेहया कहा गया,
मर्जी से बिकी तो नाम
वेश्या रखा गया,
हर बार सलीब पर,
औरत को धरा गया ...
बेटे के स्थान पर,
जब जन्मी है बेटी,
या फिर औलाद बिन,
सुनी हो तेरी गोदी,
कदम कदम पर अपशकुनी
और बाँझ कहा गया,
जब भी तेरा दामन फैला,
घर के दाग छुपाने को ,
जब भी तुमने त्याग किये थे ,
हर दिल में बस जाने को,
इक इक प्यार और त्याग
को 'फ़र्ज़' कहा गया,
पंख पसारे आसमान को,
जब जब छूना चाहा,
रंग बिरंगे सपनों को,
हकीकत करना चाहा,
तू अबला है तेरी क्या,
औकात कहा गया ...
हर बार सलीब पर,
औरत को धरा गया ...
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साथ
उन दिनों जब सबसे ज्यादा जरूरत थी मुझे तुम्हारी तुमने ये कहते हुए हाथ छोड़ दिया कि तुम एक कुशल तैराक हो डूबना तुम्हारी फितरत में नहीं, का...
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उन दिनों जब सबसे ज्यादा जरूरत थी मुझे तुम्हारी तुमने ये कहते हुए हाथ छोड़ दिया कि तुम एक कुशल तैराक हो डूबना तुम्हारी फितरत में नहीं, का...



