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Monday, 21 January 2013

'जिंदगी'


         (1)
किसी टूटते दरख़्त को
देखा है कभी,
सुनी है, उसकी चीत्कार,
ऐसे ही चीत्कार उठता है
मेरा मन भी,
जब
रौंदते हो 'तुम'
मेरी 'आत्मा' ,
कुचल देते हो
मेरे 'सपने'
दर्द को होठों में भींच,
समेट  लेती हूँ,
पलकों में आंसू सारे,
सजा लेती हूँ,
मुस्कान 'होठों पर' ,
तुम्हे नफरत जो है,
मेरे उदास चेहरे और
गालों पर लुढ़कते आंसुओं से .. !!अनु!!

     (2)

'जिंदगी'
इम्तिहान लेती है,
फिर मिलता है,
परिणाम,
 'मैं'
बगैर परिणाम की सोचे,
देती हूँ इम्तिहान,
'हर बार'
खबर है मुझे,
उसने मेरी तकदीर में,
हार और वेदना लिखी है,
अरमानों की राख लिखी है,
आशाओं की लाश लिखी है .. !!अनु!!

2 comments:

  1. Beautiful.

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  2. बहुत ही प्रभावी ... मन को मारना .. लगातार मारना ... भावों की नदी बह रही है ...

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