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Saturday, 27 October 2012

भोजपुरी गीत

बहा त पिरितिया के, फिर से बयार हो,
जबसे हैं अईले सांवर, बलमु  हमार हो।

नाही चाही चूड़ी हमके, नहीं चाही कंगना,
तुही बाटा  बिछुआ, पायल, तुही श्रंगार हो।.

जबसे तू गईला हमके, छोड़ी के विदेशवा,
सूना पड़ल साजन, अंगना दुआर हो।.

केकरा से हाल कहती, केसे दिल के बतिया,
भावे नाही गाँव, टोला, नाही संसार हो।.!!अनुश्री!!


Sunday, 21 October 2012

दुर्गा पूजा

आज दुर्गा अस्टमी है, हम लोग हर साल..इसी दिन घुमने जाते.. नवमी को इसलिए नहीं जाते थे, क्यूँ की उस दिन भीड़ बहुत होता था, और सप्तमी को कम भीड़ की वजह से घुमने का मजा नहीं आता था।

ठीक नौ बजे रात में निकलते थे, माँ, पापा, दीदी, भैया, हम और गुड्डू (छोटा भाई), वैसे तो घर में कार नहीं था, लेकिन मेरे पापा, सुपर पापा थे, बिना बताये पहले से बुक करा के रखते थे। और कपडा, 'हाँ' कपडा तो दू गो चाहिए होता था, एक गो में काम कहाँ चलता। जो कपडा पहिन के दुर्गा पूजा देखते थे, उसी को पहन के दशहरा, कभी नहीं। अईसा तो होईए नहीं सकता था। कोई सहेली या कोई जान पहचान का दुनो दिन मिल गया तो, केतना बेइज्जती हो जाता। आराम से रात में निकलते, धुर्वा, डोरंडा, और नामकुम घूम कर फिर रांची का देखते थे। फिर आखिर में खा - पी कर घर। (उस दिन घर में रात का खाना नहीं बनता था)
आज उ दिन भी नहीं है, पापा भी नहीं है, और न ही पूजा में घुमने का पहले जैसा जोश। सब कुछ बदल गया।

(कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन)

Tuesday, 9 October 2012

गीत

मेरी हर बात को जब हंस के उड़ा देते हो
है क़सम जान,,, मेरी .जान जला देते हो ...


अजब है तेरा, मेरे ख्वाब में आना जालिम,
चाँद को जलता, आफताब बना देते हो..


कभी गिरे जो मेरे अश्क, तेरे हाथों पर,
आब-ए -चश्म* को, नायाब बना देते हो,


उतर के आते हो, जब तुम 'अनु' की आँखों में,
जिंदगी को हसीन,  ख्वाब बना देते हो...



*आँसू 

Friday, 5 October 2012

'प्रेम' मन से देह तक

'प्रेम'
एक लम्बा
अंतराल हो गया,
उससे संवाद हुए,
यक़ीनन, तुम्हे याद नहीं होगी वो,
पर उसे  याद हो तुम,
तुम्हारी नीली आँखें,
शरारती मुस्कान,
'तुम्हारा' उसे  छुप छुप कर देखना,
सब याद है उसे ,
प्रेम के उन चंद सालों में
पूरी जिंदगी जी ली उसने ,
'प्रेम' सुनने में लफ्ज़ भर,
जिओ,
तो पूरी जिंदगी बदल जाती है,
तुम चाहते थे, 'पूर्ण समर्पण'
और वो, 'सम्पूर्ण व्यक्तित्व',
तुम दिल से देह तक जाना चाहते थे,
और 'वो' दिल से आत्मा तक,
तुम्हारा लक्ष्य 'उसकी  देह'
 'उसका', ' तुम्हारा सामीप्य',
उसके  लिए प्रेम, जन्मों का रिश्ता,
तुम्हारे लिए, चंद पलों का सुख,
परन्तु अपने प्रेम के वशीभूत वो,
शनैः शनैः घुलती रही,
तुम्हारे प्रेम में,
'जानती थी'
उस पार गहन अन्धकार है,
'फिर भी'
तुम्हारे लिए, खुद को बिखेरना,
मंजूर कर लिया उसने ,
'और एक दिन
तुम जीत ही गए, 'उसकी देह'
और वो  हार गयी, 'अपना मन'
'फिर'
जैसे की अमूनन होता है,
तुम्हारा औचित्य पूरा हो गया,
'और तुम'
निकल पड़े एक नए लक्ष्य की तलाश में,
'और उसने'
उन लम्हों को समेट कर
अपने आँचल में टांक लिए,
रात होते ही 'उसका आँचल',
आसमां ओढ़ लेता है,
'वो',
हर सितारे में निहारती है तुम्हे,
रात से लेकर सुबह तक.....

Wednesday, 3 October 2012

तुम ढूँढना मुझे

तुम
ढूँढना मुझे, दिल की गहराई में,
मुझको ही पाओगे, संग तन्हाई में।

फागुन की बयार में, खेलोगे गुलाल जब,
रंगों के प्यार में, धरती होगी लाल जब,
झोंका बन के आउंगी, अबके पुरवाई में।
ढूँढना मुझे, दिल की गहराई में,


सावन में झूम के, गाओगे मल्हार जब,
तेरे मेरे प्रेम से, भीगेगी फुहार जब,
बरसेगा प्रीत रस, अबके जुलाई में।
ढूँढना मुझे, दिल की गहराई में,


भीनी से खुशबु बन, महकेगा प्यार जब,
सांवर सी गोरिया, बनेगी संसार जब,
खनकेगी चूड़ियाँ, अबके कलाई में।
ढूँढना मुझे, दिल की गहराई में,