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Wednesday, 26 September 2012

औरतें

एक औरत,
जब लांघती है,
घर की देहरी,
चाहे सपनों के लिए,
चाहे अपनों के लिए,
हज़ार हिदायतें,
तमाम वर्जनाएं
बांध दी जाती हैं,
पल्लू से उसके,
गलत तो नहीं होता है ये,
बाहर की दुनिया,
वहां के लोग,
उफ्फ!!
ये जिस्म भेदती नजरें,
लपलपाती जीभ,
छूने को लपकते हाथ,
बदचलनी का तमगा,
आसानी से उपलब्ध का ठप्पा,
मुफ्त में
कितनी ही उपमाएं मिल जाती है।.
जैसे की बस,
देहरी लांघती औरत,
अपनी इज्ज़त भी वही देहरी पर
टांग आई हो।..

2 comments:

  1. आज की सच्चाई
    अच्छी रचना
    बहुत सुंदर

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  2. Shukriya Mahendra ji.. aaj naukri ke liye bahar niklalti har aurat ke liye yahi socha jata hai..

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