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Tuesday, 18 September 2012

राजू

राजू नाम था उसका, प्यारा, मासूम सा। कई जगह से फट चुके, कई जगह से पैबंद लगे कपडे पहन, चला जा रहा था, अपनी ही धुन में गुनगुनाता हुआ। उसके कदम 'माँ वैष्णो ढाबा' के पास रुक गए। 'आ गया तू' सुनते ही उसका गुनगुनाना बंद हो गया। 'एक तो देर से आया, उपर से गाना गा रहा है.. चल, जुट जा काम पर'... कहते हुए ढ़ाबे के मालिक ने एक चपत रसीद दी उसे। आँखों में आंसू भर वो जुट गया काम पर। 6 जनों का परिवार था उसका। दो भाई, दो बहन, विधवा माँ, और खुद वो। सबके भरण पोषण की जिम्मेदारी थी उसपर...
 
       यही थी उसकी दिनचर्या, सुबह पांच बजे से लेकर रात के 10 बजे तक ढाबे में रहता था वो। रोज़ समय से आने वाला राजू, अगर कभी लेट हो जाये तो ऐसे स्वागत होता था उसका। यूँ तो उसे ढाबे में तीनो टाइम का खाना मिल जाता था, लेकिन कभी कभी खाना कम पड़ जाने पर किसी किसी टाइम भूखा भी रहना पड़ता था।
  उस रोज़ भी यही हुआ था, दोपहर में खाना ख़त्म हो जाने की वजह से उसे खाना नहीं मिला। हालाँकि, उसे भूख बहुत जोरों की लगी थी। किसी तरह उसने पानी पी कर, अपनी क्षुधा शांत की। रात के खाने के इंतज़ार में, वो ख़ुशी ख़ुशी काम करता रहा.. अचानक उसकी नजर दरवाजे पर पड़ी। दो ग्राहक चले आ रहे थे। 'चल बे, दो फुल  थाली ले कर आ'.. वो चुपचाप खाना लाने चला गया। रसोई में पहुँच कर उसने देखा की खाना बहुत कम बचा है। शायद इन ग्राहकों को देने में ही ख़त्म हो जायेगा। भूख के मारे उसके पेट में मरोड़े उठ रही थी। अब उससे रहा नहीं गया, उसने रसोइये की नजर बचा कर दो रोटी अपने कपड़ों में छुपा ली। सब काम निपट जाने पर उसने थोडा नमक लिया और एक कोने में बैठ कर खाने लगा। तभी किसी काम से ढाबे का मालिक अन्दर आया, राजू पर नजर पड़ते ही वो बौखला गया। 'साले, चोर कहीं के, रोटी चुरा कर खा रहा है, अभी बुलाता हूँ पुलिस को'... राजू, रोता रहा, गिड़गिडाता रहा, लेकिन ढाबे वाले का दिल नहीं पसीजा।
 
       उस दो रोटी को चुराने की वजह से राजू पर केस चला, और उसे सजा के तौर पर बाल सुधार गृह भेज दिया गया। राजू के आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। उसे बस अपनी माँ और भाई बहनों की चिंता लगी थी। एक दिन जेलर ने उसे रोते हुए देखा। बहुत प्यार से उसके सर पर हाथ फेर कर  उन्होंने उसके रोने का कारण  पूछा। राजू ने रोते रोते सारा हाल कह सुनाया। जेलर को राजू पर बहुत दया आई, उसने जेल में ही राजू के पढना का इन्तेजाम कर दिया। एक दिन राजू की माँ आई उससे मिलने। वो माँ के गले लग खूब रोया, "माँ , माँ मुझे माफ़ कर दो, मेरी वजह से तुम सब को कितने दुःख उठाने पड़ रहे हैं".. माँ ने राजू को गले लगा लिया, उसके आंसू पोछते हुए बोली, "बेटा, ये जो जेलर साहब है न, बहुत अच्छे हैं, उन्होंने मुझे सिलाई मशीन दी है, तुम चिंता मत करो, हमारी रोजी रोटी बहुत अच्छे से चल रही है, अब तो तुम्हारे भाई बहन स्कूल भी जाने लगे हैं".. सुन कर राजू एक बार फिर जोर से रो  पड़ा, लेकिन इस बार उनकी आँखों में आंसू दुःख के नहीं बल्कि ख़ुशी के थे। उसने जेलर साहब के पैर छूने चाहे, तो उन्होंने उसे गले से लगा लिया, "मैंने अपनी तरफ से कुछ नहीं किया, ये तुम जो दिन रात मेहनत कर के दौरी बनाते हो न, उन्हें ही बेच कर मैंने ये सब किया है".
 
      दिन गुजरने लगे... राजू बड़ा हो गया।. उसने जेल से ही बी0 ए0 कर लिया.. कभी  सपने में भी नहीं सोचा था उसने कि  अपने पेट की आग बुझाने की इतनी बड़ी सजा मिलेगी उसे।. फिर एक दिन वो भी आया। जब राजू की सजा पूरी हो गयी और वो रिहा हो गया।

     तक़रीबन दो साल के बाद राजू फिर उसी जेल  की चारदीवारी के बीच नजर आया। लेकिन इस बार उसके बदन पर कैदी की नहीं बल्कि सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस की वर्दी थी।..

 ( काश की हर राजू को ऐसा हो कोई जेलर मिल जाये। तो उसकी जिंदगी बन जाये।)
  

7 comments:

  1. अच्छा लिखा आपने अनीता जी ....बधाई

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  2. bahut achi marmik kahani he raju ki , per dhany he vo jeler sahab jinhone uaski jindgi sanvari ,shabdo ke suhane motiyo se jise apne sajaya,aabhar [ geeta purohit ]

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  3. bahut marmik kahani raju ki jise apne shabdo me piroya,badhai, kash ese jeler sabhi ko mile[geeta purohit]

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  4. बहुत ही अच्छी कहानी अनीता जी ....अक्सर हम गुनहगार को ही दोष देते हैं ,पर उसने गुनाह किस वजह से किया इस पर गौर नहीं करते .....आपके पास भी सुन्दर शब्दों का खजाना है ..बधाई

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  5. बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ... बधाई सहित आपके लेखन के लिए शुभकामनाएं

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  6. बढ़िया ...इसी प्रकार लेखन मे नए प्रयोग करते रहिए

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