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Sunday, 3 March 2013

'प्रेम'


'प्रेम' 
अपनी धुरी पर, 
तुम्हारे इर्द गिर्द घुमती 
'मैं'
यदा कदा  बुन ही लेती हूँ 
कुछ सपने 
भर देती हूँ उनमे 
'इन्द्रधनुषी रंग' 
फिर माथे पर सजा, 
'टिकुली' की तरह, 
इतराती फिरती हूँ, 
हर रंग का अपना वजूद, 
अपना आकर्षण, 
'न' 'न' इसमें हकीकत का 
 काला रंग न मिलाना, 
मुझे वो बिलकुल नहीं भाते ... !!अनु!! 

1 comment:

  1. वाह ... हकीकत का काला रंग न भरना ...
    कितनी सहज है ये रचना ... ओर अर्थपूर्ण भी ...

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