Text selection Lock by Hindi Blog Tips

Tuesday, 29 April 2014

'प्रेम'

'प्रेम' 
बार बार 
लिखती हूँ तुम्हें 
'ताकि' 
तुम्हारी अनुभूतियाँ 
'यहीं' 
मेरे आस पास 
डोलती रहें, 
तुम महज 
प्रेम नहीं हो, 
'तुम' आत्मा हो,
'तुम' साँस हो,
तुम मेरे जीवन का
एक-एक पल,
मेरी इच्छा,
मेरा मान,
'और'
तुम्हीं तो हो,
'मेरे आराध्य' !!अनुश्री!!

Friday, 25 April 2014

'प्रेम'

'प्रेम' 
तुम्हारा प्रेम 
पारस था, 
और मैं, 
पत्थर, 
तुमने मुझे 
प्रेम कर के 
खरा सोना 
बना दिया, 
सबकी समझ 
से परे है,
'तुम्हारा'
'मुझे' मेरे ही लिए
छोड़ जाना,
उसे या तो
मैं समझती हूँ,
या फिर
सिर्फ तुम !!अनुश्री!!
(प्रेम अनकहे शब्दों का संसार है, जिसे सिर्फ दिल समझता है )

Thursday, 24 April 2014

'प्रेम'

'प्रेम'
कैसे मान लूँ,
तुम्हे
प्रेम नहीं था मुझसे,
तुम्ही ने तो कहा था,
'तुम इतनी प्यारी हो
कि तुम पर
प्यार के सिवा
कुछ आता ही नहीं',
'प्रेम मेरे'
कहाँ से सीखा तुमने,
मौसम के साथ
बदल जाने का हुनर,
कभी पहाड़ के
उसी टीले पर,
महसूस करना
हवाओं को,
आज भी
हमारे प्यार की
सौंधी ही खुशबू
उड़ती हैं वहाँ,
तुम्हारी
खिलखिलाती हँसी,
रूठना, मानना,
और एक दूसरे को
पा लेने की ख़ुशी,
'सुनो'
वहाँ थोड़े आँसूं भी होंगे,
हमारी आखिरी मुलाकात
पर छलके आँसूं ,
उन्हें छेड़ना भी मत,
दिल की जमीन को,
थोड़ी नमी की
जरुरत होती है,
ताकि
दिलों में यादें
पनपती रहें !!अनुश्री!! 

Tuesday, 22 April 2014

कुछ शेर

सागर से मिल के दरिया, इतना ही रह गया,
इक बूँद मेरे इश्क़ का, जो तुझमे घुल गया !!अनुश्री!!

तुझको तेरे ही लिए छोड़ जाना चाहती हूँ, 
सांसों की हर बंदिशें तोड़ जाना चाहती हूँ, !!अनुश्री!!

तुम्हीं को जोहती हैं ये निगाहें, लौट आओ तुम, 
तुम्हारा नाम लेती हैं ये आहें, लौट आओ तुम !!अनुश्री!!

ये न सोचों कि खुशियों में बसर होती है,
कई महलों में भी फांके की सहर होती है !

उसकी आँखों को छलकते हुए आँसूं ही मिले,
वो तो औरत है, कहाँ उसकी कदर होती है,

कहीं मासूम को खाने को निवाला न मिला,
कहीं पकवानों से कुत्तों की गुजर होती है,

वो तो मजलूम था, तारीख पे तारीख मिली,
जहाँ दौलत हो इनायत भी उधर होती है,

दिन गुजरता है काम करते, रात सपनों में,
जिंदगी ग़रीब की ऐसे ही बसर होती है !!अनुश्री!!

Sunday, 20 April 2014

'प्रेम'

'प्रेम' 
तुम्हे बार बार 
लिख पाना, 
सरल नहीं होता, 
फिर फिर
जीना पड़ता है 'प्रेम', 
भोगनी होती है 
पीड़ा, 
चाँद को बनाना 
पड़ता है, 
रतजगे का साथी, 
बुनने होते हैं, 
कई सारे सपने, 
और फिर सहना 
पड़ता है, 
उनके 
टूट जाने का दंश, 
'नहीं'
तुम्हे बार बार 
लिख पाना, 
सरल नहीं होता। !!अनुश्री!!

ग़ज़ल

तुम नहीं तो अब तुम्हारी याद का मैं क्या करूँ?
आँख से बहती हुई बरसात का मैं क्या करूँ?

लौट आओ कि तुम्हारा रास्ता तकती हूँ  मैं,
बिन तुम्हारे जगमगाती रात का मैं क्या करूँ?

ग़र उतरना जंग में तो साथ कुछ हिम्मत भी रख,
हौसला दिल में नहीं तो बात का मैं क्या करूँ ?

लोग कहते हैं गया फिर लौट कर आता नहीं,
तेरी यादों में घुले  लम्हात का मैं क्या करूँ?

दिल लगा कर दिल्लगी की काम ये अच्छा न था,
तुम  कहो इस अनछुए जज़्बात का मैं क्या करूँ?!!अनुश्री!!

Thursday, 3 April 2014

राजनीति

(1) 

बूँद- बूँद से भरती गागर, 
बूँद बूँद से प्यास मिटे, 
बूँद बूँद से बनता सागर, 
बूँद बूँद से तृप्ति मिले, 
तो अपने वोट की कीमत जानो, 
देश में अपना स्थान पहचानो, 
इक इक वोट से सत्ता बदलती, 
अपने को न दुर्बल जानो, 
नयी कोपलें फूटेंगी और, 
नव युग का निर्माण होगा, 
जन जन की खुशियों से सजकर, 
देश का निर्माण होगा। !!अनुश्री!!

(2)
चंद टुकड़ों पर कुत्तों को झगड़ते देखा, 
एक धमाके में सैकड़ों को मरते देखा, 
सत्ता और राजनीति की आँच ही कुछ ऐसी है, 
अच्छे अच्छों का ईमान पिघलते देखा !!अनुश्री!!