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Monday, 2 April 2012

नफरत


'तुमसे'
अब प्रेम नहीं,
नफरत करती हूँ मैं,
वो भी इतनी 'कि' अगर
तुम मरते वक़्त पानी भी मांगो न ,
तो एक बूँद पानी न दूँ तुम्हे...

ये नफरत का बीज
उसी दिन अंकुरित हो गया था,
जब कहा था तुमने,
'विवाह कर रहा हूँ मैं'
'न' सिर्फ विवाह नहीं,
'प्रेम विवाह'

दंग रह गयी थी मैं,
अगर ये तुम्हारा प्रेम है,
तो वो क्या था?
जब मेरा हाथ पकड़ कर
तुमने कहा था,
"इन हाथों
को कभी अपने
हाथों से अलग न होने दूंगा",
क्या था वो? 'प्रेम' या प्रेम के नाम पर छल,

धीरे धीरे नफरत का ये बीज,
विशाल पेड़ बन गया,
जिसके हरेक शाख पर
नफरत के सैकड़ों फूल खिलते हैं,

पर ये फूल,
हमेशा भी तो नहीं रहेंगे न,
एक दिन सूख कर गिर जायेंगे,

'कुछ', ऐसा ही होगा,
मेरे साथ भी,
तुमसे नफरत करने का,
ये झूठा आवरण
एक दिन
उतर जायेगा,

तुम सामने आओगे,
'और'
ये सारी 'नफरत',
सारी 'घृणा'
आंसुओं में ढलकर
बह जाएगी.... !!अनु!!

3 comments:

  1. Anita jee @ last lines are main thinking and medicine ../ good one.. plz visit
    http://meribaat-babanpandey.blogspot.in/2012/03/blog-post_30.html

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  2. बहुत सुन्दर लिखा आपने अनीता जी ,
    नफरत कह देने से नहीं होजाती ,कहीं न कही मुहब्बत भी छिपी होती है ...........

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  3. sach kaha aapne...pyar karne vala chah kar bhi nafrat nahin kar sakta..

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