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Monday, 6 February 2012

स्त्री

स्त्री है वो, 
जब कभी 
'मन' उद्वेलित होता है,
तो जी करता है कि 
'चीखे' 
जोर से 
'चिल्लाये' 
जार जार 
'रोये' .
लेकिन आड़े 
आ जाती है
'स्त्री' होने की गरिमा ..
लोग क्या कहेंगे?
पडोसी क्या सोचेंगे?
ठूँस लेती है ,
अपना ही दुपट्टा,
अपने मुंह में,
'ताकि'
घुट कर रह जाये
उसकी  'आवाज़',
उसके  ही गले में...
और घोंट देती है 
अपने ही हाथों
'गला'
अपने 'स्वाभिमान' का.... !!अनुश्री!!

1 comment:

  1. गहरी कसक है रचना में...एक छटपटाहट!!

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