स्त्री
जब कभी मन उद्वेलित होता है,
'तब'
जी करता है की 'चीखूँ'
जोर से 'चिल्लाऊं'
जार जार रोऊँ ..
'लेकिन फिर'
आड़े आ जाती है
'वही'
स्त्री होने की गरिमा ..
लोग क्या कहेंगे?
पडोसी क्या सोचेंगे?
ठूंश लेती हूँ,
अपना ही दुपट्टा,
अपने मुंह में,
'ताकि'
घुट कर रह जाये
मेरी आवाज़,
मेरे ही गले में...
और घोंट देती हूँ,
अपने ही हाथों
'गला'
अपने 'स्वाभिमान' का.... !!अनु!
गहरी कसक है रचना में...एक छटपटाहट!!
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