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Wednesday, 27 November 2013

रंगमंच

'दुआ है',
तुम्हारी
भावनाओं के रंगमंच
सदा ही प्रेम को
अभिनीत करते रहें,
वहाँ आंसुओं का कोई
स्थान न हो।
तुम्हारे शब्द अब
'अभिनय' सीख गए हैं,
उन्हें अदाकारी भी आ गयी है,
वो 'झूमने' लगे हैं'
'मुस्कुराने' लगे हैं,
'खिलखिलाने' लगे हैं।
परन्तु
तुम चाह  कर भी
मेरी स्मृतियों को
खुद से अलग नहीं कर सकते।
मेरा 'प्रेम' तुम्हारी
हर धड़कन,
हर सांस में शामिल है,
मेरा वजूद तुममे
इस कदर रच बस गया है कि
'तुम', 'तुम' न होकर
'मैं' बन गए हो।
और 'मैं' , 'मैं' इस
जीवनरूपी रंगमंच पर
हो कर भी नहीं होती,
मेरे मानसपटल से तुम्हारा
प्रतिबिम्ब ओझल ही नहीं  होता।
किसी और ही दुनिया में
विचरती हूँ मैं,
जहाँ सिर्फ मैं होती हूँ,
जहाँ सिर्फ तुम होते हो।
तुम्हारे शब्दों में सदा - सदा के लिए
समाहित होना चाहती हूँ मैं,
चाहती हूँ
'अपने अस्तित्व को खोकर,
पूर्णता की प्राप्ति'। 

1 comment:

  1. मेरा वजूद तुममे
    इस कदर रच बस गया है कि
    "तुम" "तुम "नो होकर "मै "बन गए हो |..
    ..चाहती हूँ " अपने अस्तित्व को खोकर ,
    पूर्णता की प्राप्ति |.........बहुत खूब अभिव्यक्ति ...

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