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Tuesday, 5 June 2012

सफ़र

शाम घिर आई,
'दूर'
डूबते सूर्य की स्वर्णिम आभा,
जैसे प्रकृति ने निद्रामग्न होने के लिए,
सुनहरी, चादर तान ली हो,
हमेशा से ही यह दृश्य.. मुझे लुभाता रहा है,
ट्रेन बढती जा रही,
अपने गंतव्य की ओर,
'ओर मैं'
प्रकृति की इस छटा में डूबकर,
सिंदूरी हो रही हूँ,
'तुम्हारे शहर'
'हाँ' तुम्हारा ही तो है वो,
विदा होते ही मैं बदल गयी,
मेरा शहर बदल गया,
'तो' मैं कह रही थी..
तुम्हारे शहर की ओर बढ़ता,
मेरा एक एक कदम,
मुझे अतीत की गहराईयों में ले जा रहा,
इस शहर को छोड़ने से पहले, 
विदा लेने से पहले,
एक वादा किया था अपने आप से,
जिस बेरुखी से तुमने,
मेरा साथ छोड़ा था 'न' ..
अगर कभी तुम्हारा सामना हुआ भी..
'तो'
कोई प्रतिक्रिया नहीं करुँगी... 
मगर जाने अनजाने कभी दिख गए तो ???
तुम्हारी नजर मुझ पर पड़े,
इससे पहले ही, तुम्हे अनदेखा कर निकल जाउंगी...
'शायद नहीं'..
तुम्हे अनदेखा नहीं कर सकती मैं,
एक बार अगर मैं कर भी दूँ तो.. ये दिल..???
ये दिल तो धड़कने लगेगा,
'जैसे' अभी अभी यौवन की दहलीज़ पर
कदम रखा हो..
'जानते हो क्यूँ?'
ये आज भी वहीँ है, उसी जगह, उतना ही मासूम...
उम्र तो जैसे इसे,
छू कर भी नहीं गयी....

'बस'
वक़्त बदलता रहा..
देहयष्टि बदलती रही..
जिंदगी बदलती रही..
!!अनु!!