Monday, 16 July 2012

'मैं' 'नीलकंठ' न सही


'मैं'
'नीलकंठ' न सही,
फिर भी पीती हूँ,
'तुम्हारे'
अपमान से भरे,
'विष' के प्याले...
कई दफे,
'तुम्हारे'
जहर बुझे, व्यंग बाणों
से छलनी होते 'मन' पर,
'स्वयं' ही लगाती हूँ,
'मरहम'

'मैं'
'शिव' भी नहीं,
फिर भी,
'तुम्हारे'
क्रोध के तीव्र वेग को,
समाहित करती हूँ,
खुद में,
परिवर्तित करती हूँ,
निर्मल, शीतल धारा में,
'और'
अर्पित करती हूँ,
तुम्हारे अपनों को,
'ताकि'
तुम्हारे 'अपने'
तृप्त हो सकें,
'तुम्हारी'
वाणी की 'मिठास' से..... !!अनु!!

Monday, 2 July 2012

छोटी छोटी बातें ....



हर बात को हंस कर,
उड़ा देना आसन नहीं होता,
नम पलकों का,
मुस्कुरा देना आसन नहीं होता,
सपनों के टूटने का दर्द,
हसरतों के छूटने का दर्द,
तन्हाई को दिल में,
पनाह देना आसान नहीं होता.... !!अनु!!***
तुम्हारी जुदाई से उपजा 'अधूरापन',
बड़ा नहीं होता, 
मेरी अश्कों की सिचाई से,
जो पक जाती ये फसल,
तो इसे काट कर, 
अगली बार बो देती, 
हंसी और ख़ुशी की फसल .... !!अनु!!
गर उलझने सुलझ जाये, चाहते मिट जाएँ...तो ऐ मेरे दोस्त, 'जिंदगी मुकम्मल 'न' हो जाये'..
पुरे जहान में 'तुमसा', कोई नहीं.. के तुम, तुम हो.. 'सिर्फ तुम'..*****
अक्सर मेरी रातें गुजरती हैं .. 'तन्हा', चाँद में तुम्हारा अक्स तकते हुए....... !!अनु!!****
कितनी कहानियां गढ़ जाते हो तुम, मेरी और अपनी कहानी ले कर..!!अनु!!****
कुछ अजनबी हो कर भी, संग निभाते चेहरे,'और' कुछ अपने हो कर भी, दूर जाते चेहरे..!!ANU!!***
‎'मैं' और 'तुम', नदी के दो 'किनारों' की तरह, हमेशा साथ रहेंगे, 'बिना मिले'... !!अनु!!***
मीलों की दुरी, मिलन में बाधा नहीं, 'तुम' 'देह' से दूर हो, ह्रदय से नहीं.. !!अनु!!*****
तुम्हे तो कभी अपने प्यार में बांध कर नहीं रखा मैंने ... फिर क्यूँ .... फिसलते चले गए बंद मुट्ठी में पड़े रेत की तरह...****

Tuesday, 5 June 2012

सफ़र

शाम घिर आई,
'दूर'
डूबते सूर्य की स्वर्णिम आभा,
जैसे प्रकृति ने निद्रामग्न होने के लिए,
सुनहरी, चादर तान ली हो,
हमेशा से ही यह दृश्य.. मुझे लुभाता रहा है,
ट्रेन बढती जा रही,
अपने गंतव्य की ओर,
'ओर मैं'
प्रकृति की इस छटा में डूबकर,
सिंदूरी हो रही हूँ,
'तुम्हारे शहर'
'हाँ' तुम्हारा ही तो है वो,
विदा होते ही मैं बदल गयी,
मेरा शहर बदल गया,
'तो' मैं कह रही थी..
तुम्हारे शहर की ओर बढ़ता,
मेरा एक एक कदम,
मुझे अतीत की गहराईयों में ले जा रहा,
इस शहर को छोड़ने से पहले, 
विदा लेने से पहले,
एक वादा किया था अपने आप से,
जिस बेरुखी से तुमने,
मेरा साथ छोड़ा था 'न' ..
अगर कभी तुम्हारा सामना हुआ भी..
'तो'
कोई प्रतिक्रिया नहीं करुँगी... 
मगर जाने अनजाने कभी दिख गए तो ???
तुम्हारी नजर मुझ पर पड़े,
इससे पहले ही, तुम्हे अनदेखा कर निकल जाउंगी...
'शायद नहीं'..
तुम्हे अनदेखा नहीं कर सकती मैं,
एक बार अगर मैं कर भी दूँ तो.. ये दिल..???
ये दिल तो धड़कने लगेगा,
'जैसे' अभी अभी यौवन की दहलीज़ पर
कदम रखा हो..
'जानते हो क्यूँ?'
ये आज भी वहीँ है, उसी जगह, उतना ही मासूम...
उम्र तो जैसे इसे,
छू कर भी नहीं गयी....

'बस'
वक़्त बदलता रहा..
देहयष्टि बदलती रही..
जिंदगी बदलती रही..
!!अनु!!

Friday, 18 May 2012

कभी - कभी



कभी - कभी,
नाहक ही,
तुम्हारी सोच की फसल,
लहलहा उठती है 'मन में',
जाने क्यूँ होता है ऐसा,
मैं तो तुम्हे याद भी नहीं करती....
'हाँ'कभी कभी कोई ख़ास व्यंजन बनाते वक़्त,
 ये ख्याल जरुर आता है,
 क्या ये आज भी तुम्हारी पसंद में शामिल होगा?
मौसम के साथ मिजाज जो बदल जाते हैं,
और फिर अरसा हो भी तो गया...
जब कभी बाज़ार में, दिख जाते हैं,
तुम्हारे पसंदीदा रंग के कपडे,
'या फिर'
अनायास ही, परफयूम की जानी पहचानी सी खुशबू,
 तैर जाती है हवाओं में, 'तब' ख्याल आता है तुम्हारा....
हाथों में रचती हुई मेहँदी के साथ,
जिनमे तुम, अपना नाम ढूंढते थे,
कभी - कभी,
तुम्हारी यादें भी महक जाती हैं...
लेकिन 'हाँ',
इससे ये साबित नहीं होता, के मैं तुम्हे याद करती हूँ...
घर, बच्चे
कितने सारे काम
इतनी फुर्सत कहाँ,
कि मैं तुम्हे याद करूँ
बस यूँ ही
कभी - कभी,
नाहक ही,
तुम्हारी सोच की फसल,
लहलहा उठती है 'मन में.

!!अनुश्री!!

Tuesday, 8 May 2012

लीची

'लीची' सब लोग तो जानते ही होंगे.. लेकिन एक ख़ास बात, पता नहीं होगी किसी को... 'हाँ' मेरे रांची के दोस्त शायद जानते हों... 'लीची' का पत्ता और 'पुटुष' का बीज, दोनों मिला कर खाने में मुह एकदम पान खाने जैसा लाल हो जाता है.. :).. माँ को बहुत चिढाते थे.. 'देख अम्मा... हम पान खाय है'.. और जब वो गुस्सा हो जाती, तब बताते थे.. कि ' ये तो लीची का पत्ता है'..:)..  मामा का घर मुजफ्फरपुर में है.. करीब करीब हर साल भेज देते थे.. अब तो कानपूर में खरीद कर खाना होता है.. लेकिन तब कि बात अलग थी..सब भाई बहन.. एक एक झोपा ले कर बैठ जाते थे..

Saturday, 28 April 2012

तुम्हारा जाना

"जानाँ"
तुम्हारा जाना,
कहाँ रोक पाई थी तुम्हे,
'जाने से'
जी तो बहुत किया,
हाथ पकड़ कर रोक लूँ तुम्हे,
क्या करती?
जिस्म ने जैसे आत्मा का साथ देने से, 
इनकार कर दिया हो.. 
बुत बनी बैठी रही, 
'और तुम ' 
सीढ़ी-दर- सीढ़ी उतरते चले गए,   
दौड़ कर आई छज्जे पर,
मुझे देख कर मुस्कुरा पड़े थे,
और हाथ हिला कर
'विदा लिया'..
छुपा गयी थी मैं,
अपनी आँखों की नमी,
अपने मुस्कुराते चेहरे के पीछे,
जानते हो, बहुत रोई थी, 
तुम्हारे जाने के बाद.. 
तुम्हारा फ़ोन आता, 
'पर तुम' 
औपचारिकता निभा कर रख देते, 
"मैं"     
मुस्कुरा पड़ती,
ये सोच कर, के तुम जानबूझकर सता रहे हो,
कैसा भ्रम था वो? टूटता ही नहीं था, 
लेकिन भ्रम तो टूटने के लिए ही होते हैं न, 
टूट गया एक दिन, मेरा भ्रम भी, 
ख़त्म हो गयीं सारी औपचारिकताएं... 
कितने आसन लफ़्ज़ों में, 'कहा था तुमने', 
"मुझे भूल जाना" 
"जानाँ" 
भूलना इतना ही आसान होता, 
'तो'  
तुम्हारे विदा लेते ही, भूल गयी होती तुम्हे, 
'खैर' 
कभी तो आओगे, 
शायद सामना भी होगा, 
'बस' 
इतना बता देना, 
"मेरी याद नहीं आई कभी?"  

साथ

उन दिनों जब सबसे ज्यादा जरूरत थी मुझे तुम्हारी तुमने ये कहते हुए हाथ छोड़ दिया कि तुम एक कुशल तैराक हो डूबना तुम्हारी फितरत में नहीं, का...