Tuesday, 14 January 2014

सरस्वती वंदना

हे हंसवाहिनी, हे शारदे माँ,
विद्या का तू उपहार दे माँ,
जीवन पथ पर बढ़ती जाऊँ,
अपनों का विश्वास बनूँ माँ,
अंधियारे को दूर भगा दूँ,
ऐसी तेरी दास बनूँ माँ,
तेरी महिमा जग में गाउँ ,
अधरों को तू उदगार दे माँ,
हे हंसवाहिनी, हे शारदे माँ,
विद्या का तू उपहार दे माँ,
मधु का स्वाद लिए है ज्यो अब,
विष का भी मैं पान करूँ माँ,
फूलों पर जैसे चलती हूँ,
शूलों को भी पार करूँ माँ,
तूफानों में राह बना लूँ,
ज्ञान का तू भण्डार दे माँ ,
हे हंसवाहिनी, हे शारदे माँ,
विद्या का तू उपहार दे माँ.. 

Monday, 13 January 2014

'मुझ पर'

'मुझ पर' 
नहीं लिखी जा सकती, 
कोई 'प्रेम'
कविता, 
नहीं लिखे जा सकते हैं 
गीत, 
'मैं' नहीं उतरती,
सुंदरता के मानकों
पर खरी,
जिसमे निहायत ही जरुरी है,
चेहरे पर 'नमक' का होना,
'जरुरी है', आँखों में
शराब की मस्ती,
'और' इससे भी जरुरी है,
'जिस्म' का सांचे में ढला होना,
'मुझ पर तो'
कसी जाती हैं फब्तियां,
लिखा जाता है व्यंग,
जिस्मों को पढ़ती,
उन पर गीत लिखती 'नजरें'
क्यूँ नहीं पढ़ पाती,
आत्मा की चीत्कार,
'उनकी वेदना',
'क्यूँ' तन की सुंदरता
भारी पड़ जाती है,
मन की सुंदरता पर ??? !!अनु!!

Friday, 3 January 2014

ग़ज़ल

लम्हा लम्हा ये मन यूँ पिघलता रहा,
उसके सीने में दिल बन धड़कता रहा।

उसकी चाहत की खुश्बू हवा बन गयी,
सुबह से शाम तक वो महकता रहा।

तेरे जाने का ये दिल पे आलम रहा,
रात रोती रही दिन सिसकता रहा।

उनके पहलु में देखा किसी और को,
शमा बेदम हुई दिल सुलगता रहा।

मेरी नजरों में वो बस गया इस कदर,
रात भर ख्वाब से वो गुजरता रहा।  

Monday, 9 December 2013

' स्त्री'

' स्त्री'
नहीं निकल पायी कभी,
'देह' के दायरे से बाहर
चाहे वो सलवार कुर्ते में,
शरमाती, सकुचाती सी हो
चाहे, इस सो कॉल्ड
मॉडर्न सोसाइटी की
खुले विचारों वाली,
कुछ  नजरें बेंध ही देती हैं
उनके जिस्म का पोर पोर,
भरी भीड़ में भी.

'कभी देखना'
किसी गश खा कर गिरती हुई
लड़की को,
'देखना'
कैसे टूटते हैं, 'मर्द'
उसकी मदद को,
और टटोलते हैं,
'उसके' जिस्म का 'कोना - कोना' ।

'देखना'
किसी बस या ट्रेन में
भरी भीड़ में चढ़ती हुई
'स्त्री' को,
और ये भी देखना,
'कैसे' अचानक दो हाथ
उसके उभारों पर दबाव बना,
गायब हो जाते हैं.

देखना बगल की  सीट पर बैठे
मुसाफिर के हाथ नींद में कैसे
अपनी महिला सहयात्री के
नितम्बों पर गिरते हैं।

जवान होती लड़कियों को
गले लगा कर
उनके उभारों पर हाथ फेरते
रिश्तेदारों को देखना,

और फिर कहना,
क्या अब भी है 'स्त्री'
देह के दायरे से बाहर। 

Sunday, 1 December 2013

जीवन

दुनिया रस्ता टेढ़ा मेढ़ा, जीवन बहता पानी है,
मंजिल पर पंहुचा है वो, जिसने हार न मानी है,

सुख दुःख, दुःख सुख की बातों पर, देखो दुनिया है मौन धरे,
जीवन में गर दुःख न हो तो, ख़ुशी की इज्जत कौन करे,
हर घर और आँगन की, यही एक कहानी है।
मंजिल पर पंहुचा है वो, जिसने हार न मानी है, 

गर स्त्री बन आयी हो तो, इसका तुम अभिमान करो,
कुछ भूलो तो भूलो लेकिन, इतना हरदम ध्यान करो,
रानी लक्ष्मी बाई की गाथा, रखना याद जुबानी है।
मंजिल पर पंहुचा है वो, जिसने हार न मानी है, 

बाधाओं से डर कर रुकना, है जीवन का नाम नहीं,
तूफानों के आगे झुकना, इंसां तेरा काम नहीं,
हर मुश्किल को पार करे वो, क़दमों में जिसके रवानी है।
मंजिल पर पंहुचा है वो, जिसने हार न मानी है,

Wednesday, 27 November 2013

रंगमंच

'दुआ है',
तुम्हारी
भावनाओं के रंगमंच
सदा ही प्रेम को
अभिनीत करते रहें,
वहाँ आंसुओं का कोई
स्थान न हो।
तुम्हारे शब्द अब
'अभिनय' सीख गए हैं,
उन्हें अदाकारी भी आ गयी है,
वो 'झूमने' लगे हैं'
'मुस्कुराने' लगे हैं,
'खिलखिलाने' लगे हैं।
परन्तु
तुम चाह  कर भी
मेरी स्मृतियों को
खुद से अलग नहीं कर सकते।
मेरा 'प्रेम' तुम्हारी
हर धड़कन,
हर सांस में शामिल है,
मेरा वजूद तुममे
इस कदर रच बस गया है कि
'तुम', 'तुम' न होकर
'मैं' बन गए हो।
और 'मैं' , 'मैं' इस
जीवनरूपी रंगमंच पर
हो कर भी नहीं होती,
मेरे मानसपटल से तुम्हारा
प्रतिबिम्ब ओझल ही नहीं  होता।
किसी और ही दुनिया में
विचरती हूँ मैं,
जहाँ सिर्फ मैं होती हूँ,
जहाँ सिर्फ तुम होते हो।
तुम्हारे शब्दों में सदा - सदा के लिए
समाहित होना चाहती हूँ मैं,
चाहती हूँ
'अपने अस्तित्व को खोकर,
पूर्णता की प्राप्ति'। 

Tuesday, 26 November 2013

एक अधूरे फ़साने का पूरा अंत

एक अधूरे फ़साने का पूरा अंत -१
दृश्य - १
 उसकी नजरें चारों ओर कुछ ढूंढ रही थी, 'नहीं' उसे शायद किसी का इंतजार था । आज उसने वादा किया था उससे पहाड़ी पर मिलने का और कहा था कि वो शाम ढलने से पहले उसे आ कर ले जायेगा और हमेशा के लिए उसे अपना  लेगा।  'वो' सुबह से पहाड़ी पर खड़ी है, सुबह से दोपहर हुई, दोपहर से शाम और 'अब' तो रात ने अपना दामन फैलाना शुरू कर दिया  है।  पर उसे यकीं है, 'वो' अपना वादा नहीं तोड़ सकता, 'वो' आएगा, जरुर आएगा।
दृश्य - २ 
'वो' चलने से पहले अपने माता पिता को सारी बात बता कर उनका आशीर्वाद लेने गया।  उन्होंने कहा ' अगर वो इस घर में आयी तो हमारा मरा मुँह देखोगे', उसके उठे हुए कदम जहाँ के तहाँ रुक गए।  'वो' जानता था, 'वो' टूटती साँस तक उसका इन्तजार करेगी।  'वो' अपनी बेबसी पर फफक कर रो पड़ा।

दृश्य - ३
रात बहुत गहरी हो चली थी, चारों ओर बस पेड़ों की सनसनाहट, हवा की  सायं सायं और जानवरों कि आवाज़ों के सिवा कुछ भी न था।  उसकी आस भी अब जवाब देने लगी थी।  'वो' उठी, शायद लौटने के लिए।  लेकिन 'नहीं' उसके कदम उस गहरी खाई की ओर बढ़ चले।  'और' एक चीख के साथ सब शांत हो गया।

(एक अधूरे फ़साने का पूरा अंत -१ ) 

एक अधूरे फ़साने का पूरा अंत -2
'वो' चला गया, उसकी आँखें तब तक उसका पीछा करती रहीं, जब तक  ओझल नही हो गया।  पलकों पर ठहरे आँसूं छलक ही पड़े, इतना आसान नहीं था, मन  को समझा लेना।  क्यूँ नहीं रोक पायी 'उसे' , 'उफ़' ये मर्यादाओं, बंधनों, उम्मीदों की ऊँची ऊँची लहरें, उसे पार जाने ही नहीं दे रही थी, और 'वो' था कि बस आँखों से ओझल होता चला जा रहा था।  शायद चाह कर भी न चाहना इसे ही कहते हैं।  एक ब्याहता को चाह लेना जितना आसान था, उतना ही मुश्किल था, उसका साथ निभाना।  'वो' समझ गया था कि 'उसके' अपने रास्ते हैं 'वो' उन रास्तों पर 'उसके' साथ नहीं चल सकता।  इसलिए छोड़ गया 'वो' , 'उसे' उसकी ही ख़ुशी के लिए।  'और' अपने हिस्से लिखवा लिया, सिर्फ 'ग़म', 'आँसू' और 'तन्हाई' ।


साथ

उन दिनों जब सबसे ज्यादा जरूरत थी मुझे तुम्हारी तुमने ये कहते हुए हाथ छोड़ दिया कि तुम एक कुशल तैराक हो डूबना तुम्हारी फितरत में नहीं, का...