अपने अहसास को शब्दों में बाँधने की छोटी सी कोशिश …
Thursday, 13 October 2011
चाँद
ये चाँद, क्यों हैं? इतना आकर्षक... जब भी सामने आता है, भावनाएं ज्वार भाटा सी बेकाबू हो जाती हैं... हसरतें होती हैं, पूरे उफान पर.. उसे जी भर निहारने की चाह, दामन में समेटने की चाह.. जैसे आतुर हो लहरें .. तटबंधों को तोड़ कर, किनारे से मिल जाने को...
वाह अब कहाँ है वह 'चाँद' अब तो कभी कभार जब गांव में बिजली आ जाती है तो खम्भे से लटका बल्ब चाँद ........ का अहसास करता है. http://ratnakarart.blogspot.com/
वाह
ReplyDeleteअब कहाँ है वह
'चाँद'
अब तो कभी कभार
जब गांव में
बिजली आ जाती
है तो
खम्भे से लटका
बल्ब
चाँद ........
का अहसास करता है.
http://ratnakarart.blogspot.com/