रिमझिम बारिश की बूँदें,
ज्यों पड़ती हैं,
इस तपती जमीं पर,
उठती है खुशबू,
'सौंधी सी'
फ़ैल जाती है, 'फिज़ाओ में'
हाथ पकड़ कर,
खीच ले जाती है मुझे,
साल-दर-साल पीछे,
महसूस किया है, बूंदों में,
तुम्हारे अक्स को,
तन पर पड़ते, छीटों में,
तुम्हारे स्पर्श को....
फिर से जी लेती हूँ,
उस सुंगंधित पल को,
क्या जिया है किसी ने,
'आज में', अपने कल को.... ?
!!अनु!!
Friday, 16 September 2011
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साथ
उन दिनों जब सबसे ज्यादा जरूरत थी मुझे तुम्हारी तुमने ये कहते हुए हाथ छोड़ दिया कि तुम एक कुशल तैराक हो डूबना तुम्हारी फितरत में नहीं, का...
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जिन दिनों उन्हें पढ़ना चाहिये था, ककहरा, सपने, बचपन उन्हें पढ़ाया जा रहा था, देह, बिस्तर, ग्राहक..... !!अनुश्री!!
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