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Tuesday, 25 August 2015

कविता तुम जननी, तुम माँ !!

आसान नही था
उम्र के इस मोड़ पर
कविता लिखने की
शुरुआत करना,
कहाँ कविता की शैशवस्था
और कहाँ उम्र की प्रौढ़ावस्था,
लाज़िमी था, मजाक उड़ने का,
नकार दिए जाने का डर,
कविता ने पढ़ा मुझे,
उसने कहा,
मत लिखो मुझे, 'बस'
टूट जाने दो मन का बाँध,
बह जाने दो भाव की धारा,
उन्हें पहनाती जाओ,
शब्दों की पैरहन,
और यूँ ही बनती गयी कविता,
सच कविता,
तुममें उतर कर मेरे शब्द
बंजारे नहीं रह जाते,
उन्हें ठिकाना मिल जाता है,
वे बच जाते हैं उदण्ड होने से,
नहीं फूटते कहीं भी किसी पर भी,
'कविता' तुम मन के सारे
वेग सहकर समेट लेती हो धारा,
तृप्त कर देती हो आत्मा,
हर लेखन के बाद प्रदान करती हो,
एक नया 'मन', नया 'जीवन' ,
कविता तुम जननी, तुम माँ !!

कविता

कविता कहती है,
मत बाँधो मुझे,
शब्दों के गहन जाल में,
मुक्त रखो,
घृणा से,
तुम अपना क्रोध,
अपनी नफरत थोपना,
बंद करो मुझपे,
लिखना ही है,
तो युवा मन का जोश लिखो,
धधकता आक्रोश लिखो,
कि 'जलन' जला देगी,
तुम्हारा ही 'मैं' !!अनुश्री!!

Friday, 21 August 2015

'कैक्टस'

उन दिनों
जब हारने लगा था
'मन',
टूटने लगी थी 'आस',
'वो' मन की जमीन पर
खुरच - खुरच कर
लिखने लगी थी 'जीत'।
आस के अनेकानेक दिये
जोड़ कर उसने उम्मीद का
एक नया सूरज
तैयार कर लिया।
तपते रेगिस्तान के बीच
प्यास से जल कर
मर जाने की बजाय उसने
तय कर लिया
'कैक्टस' हो जाना !!अनुश्री!!

Thursday, 6 August 2015

तटस्थ रहता है 'प्रेम'

हृदय सुनता नहीं है,
समझता भी नहीं है कि
नेह के बन्धन
सोच - समझकर बाँधे जाने चाहिए,
अपनी तरफ के सिरे को
हाथ में थामे
सपनो में खोया मन,
 अचानक छूट गए
दूसरे सिरे के झटके से
चीत्कार उठता है,
उफ़! वो उठे हुए
हाथ का उठा रह जाना,
आवाज़ देते कण्ठ का
अवरुद्ध हो जाना,
टूट जाना चाहता है,
मन का बाँध ,
बिखर जाने की इच्छा लिए,
बही हुई भावनाओं के
बावजूद भी, कहीं गहरे,
तटस्थ रहता है
'प्रेम'
किसी के जिन्दगी से
निकल जाने के बाद या
निकाल दिए जाने के बाद भी !!अनुश्री!!