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Monday, 29 June 2015

'मृगतृष्णा'

जाने कितने ही नक्षत्रों, 
आकाशगंगाओं को लाँघ कर, 
लौट आता है 'मन'
'तुम' तक, बार- बार,  
ये जानते हुए कि 
तुम्हारी आस, 
इक प्यास है, 
चिरस्थायी प्यास, 
आह! जीवन है, 
तुम्हारे और मेरे प्रेम की 
'मृगतृष्णा', 
हाँ, जादूगर हो 
'स्वामी' 'तुम' !!अनुश्री!!

Friday, 26 June 2015

बलात्कार

बालात्कार  से पीड़ित लड़कियाँ,
बचाये रखना चाहती हैं
अपनी जिजीविषा,
फूँक देना चाहती हैं,
स्याह  अतीत,
मन की पीड़ा,
कौमार्य की टूटन,
तार हुए दामन का
एक - एक टुकड़ा।
छटपटाती हैं कि निकल जायें
जिस्म के लिजलीजेपन  से बाहर,
धुल लेना चाहती हैं 'मन'
कई - कई बार नहा कर।
जाने कितनी ही बार सिलती हैं
'मन',
परन्तु अखबार की  एक खबर
 'बलात्कार',
उधेड़ कर  रख देती है सारी सीलन।
रिसने लगता है रक्त।
पागलों की तरह नोचती हैं
अपना ही जिस्म,
एक - एक छुवन
नोच फेंक देना चाहती हों जैसे।
वक़्त के चाँटे
सूखने नहीं देते आँसू,
उगने नहीं देते मुस्कान।
जिस्म का जख्म
एक - एक कर भर भी जाये तो क्या,
 कैक्टस की तरह फैलते हैं
'मन' के जख्म।
वक़्त और समाज इन्हें भरने नहीं देता,
बल्कि खुरच - खुरच कर
बना देता है 'नासूर' !!अनुश्री!! 

Wednesday, 24 June 2015

न मिलन , न बिछोह

मेरे 'तुम' 
तमाम प्रयासों के बाद भी 
नहीं मार पायी 
हृदय में जन्मा प्रेम, 
खींच निकालना चाहा बाहर, 
कुचलना चाहा 
'मैं' तले,  
'असफल' रही, 
स्वीकारती हूँ, 
नियति ने रच रखा है हमें 
पृथक संसार के लिए, 
'सच', 
कुछ भी तय नहीं होता, 
न मिलन , न बिछोह। 
हम फिर - फिर मिलेंगे, 
फिर - फिर बिछड़ेंगे, 
अनेक बिम्बों में ढलते हुए, 
यह  क्रम, चलता रहेगा, 
अनन्तकाल तक !!अनुश्री!!  

Friday, 19 June 2015

'रंगरेज'

भोर की उनींदी आँखों में 
उपजा एक ख्याल, 
प्रेम 'रंगरेज' भी तो है, 
रंग देता है, 'मन', 
'सपने', 'जीवन' 
और हाँ 'ख्याल' भी, 
तुम्हें याद है न, 
हमारा अनायास मिल जाना, 
पता नहीं कब 
वक़्त ने जड़ दिया था 
वो रंगीन पन्ना 
हमारे जीवन में, 
वो 'एक दिन' 
हमारे पुरे जीवन का 'सार', 
जाते वक़्त तुमने कहा, 
'मौसम' 
फिर लौट कर आने के लिए जाते हैं, 
लेकिन हर बार 
मौसम के साथ 
रंगों का आना 
तय तो नहीं होता न, 
जाने, इस मौसम के रंग, 
मुझसे मिले न मिलें, 
मुझपर खिलें न खिलें !!अनुश्री!!

'तुम'

तुम
बढ़ जाना आगे,
अपने सपनों,
अपनी सम्पूर्णता की तलाश में,
वो
तुम्हारे प्रेम में,
अपने अधूरेपन के
साथ स्थिर हो जाना चाहती है,
उसे नहीं लौटना है पीछे,
और न ही आगे बढ़ने की
तमन्ना है,
'हाँ'
वो गुम जाना चाहती है,
अपने एकाकीपन के साथ,
कि फिर कोई संगीत,
उसे सुनाई न दे ,
उसे नहीं बुनना
कोई खुशियों भरा गीत,
वो काट देना चाहती है रातें,
'चाँद' के साथ,
जो सवाल नहीं करता,
बस 'चुप' सुनता है,
'चुप' कहता है,
उतार लेना चाहती है तुम्हें
आँसुओं की एक- एक बूँद में,
ये जो आसमान ने,
समेट  रखे हैं न,
चाँद, सितारे, अपने बाहुपाश में,
वो भी समेट लेना चाहती है
दिल के किसी कोने में,
'मन'
छुपा लेना चाहती है,
जगह - जगह से उधड़ा हुआ 'मन',
उसे पता है,
उसकी उधड़न रफू करने वाला,
रफ़ूगर नहीं लौटने वाला !!अनुश्री!! 

Tuesday, 16 June 2015

जिन्दगी की रेल

जिन्दगी की रेल
सरपट दौड़ती जा रही है,
वो उचक - उचक कर
खिड़की से निहारती है,
पीछे छूटता बचपन,
घर का आँगन,
यौवन की दहलीज़ का
पहला सावन,
पहले प्यार की खुशबू,
उन दिनों के
मौसम का जादू
जो अक्सर सर चढ़ कर बोलता था।
और भी बहुत कुछ
देखना चाहती थी वो,
अपना आसमान छू
लेने का सपना,
चाँद - सितारों को
मुट्ठी में भर लेने का सपना,
लेकिन रेल की तेज रफ़्तार ने
सब धुंधला कर दिया,
धीरे - धीरे छूट गया सब।
समझने लगी है वो,
ख़ाक हो जाना है उसे
यूँ ही
स्वयं में स्वयं को तलाशते हुए,
जल जाना है
अपनी ही प्यास की आग में
'एक दिन' !!अनुश्री!! 

'रंग'

उसने 
भगवान से कभी भी 
अपने लिए नहीं माँगी, 
रंगीन दुनिया, 
रंगीन सपने, 
रंगीन जिंदगी,
वो खुश है,
अपनी ब्लैक एण्ड व्हाइट
जिन्दगी से,
उसे पता है,
रंगीन दुनिया के रंगीन चेहरे
बहुत जल्दी
'रंग' बदल लेते हैं !!अनुश्री!!



मुझे नहीं चाहिए, 
ढेर सारी खुशियां, 
दुआएं, 
मन्नतों के धागे, 
तुम्हारे सुबह - सुबह 
मुस्कुरा भर देने से ही
खिल जाता है
'मेरा दिन' !!अनुश्री!!

मछुआरे

मछुआरे,
स्वाभाविक है तुम्हारा,
'तुम्हारे' फेंके हुए जाल में,
मछली फंस जाने पर  खुश होना,
कितनी तारीफें बटोरी थी 'तुमने'
इस बहादुरी पर,
'तुम' समझ नहीं पाये
मछुआरे,
हज़ारों मछलियों की भीड़ में से,
सिर्फ उसका फंस जाना,
जरुरी नहीं समझा तुमने कि देख पाते,
उसकी आँखें,
उसकी रफ़्तार,
जो सिर्फ तुम्हारे सानिध्य की खातिर,
स्वयं ही चली आई थी
जाल की तरफ,
काश कि 'तुम' जान पाते,
'वो' प्रेम में थी 'तुमसे' !!अनुश्री!! 

Tuesday, 2 June 2015

'प्रेम' ऐसा भी होता है क्या?

'प्रेम' ऐसा भी होता है क्या?
मिले तो यूँ,
कि जैसे जन्मों से साथ थे,
बिछड़े तो यूँ,
जैसे कि पहचान ही न थी,
तुम्हारा चले जाना,
स्वीकार नहीं होता,
बिना कुछ कहे,
बिना कुछ बताये,
कम से कम मेरा दोष तो बता देते,
बताते तो सही,
कब, कहाँ मैंने आहत किया तुम्हें ?

तुम्हें दोष नहीं दे रही,
कोई शिकायत भी नहीं कर रही,
याद है तुमने कहा था,
"बिलकुल पगलिया हो तुम,
जमाना नहीं समझती" ,
उस वक़्त लगा था,
'तुम'
मजाक कर रहे हो,
लेकिन नहीं,
कितना -कितना सच कहा था तुमने,
सचमुच 'पगलिया' थी मैं,
नहीं समझ पायी 'जमाना'
तुम्हें भी, कहाँ समझ पायी मैं .........