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Friday, 23 May 2014

तुम्हारा प्रेम

तुम्हारा प्रेम 
उधार रहा मुझ पर, 
क़िस्त -दर - क़िस्त 
चुकाना है मुझे, 
'तुम' 
मेरे जीवन के 
आधार स्तम्भ, 
मेरे मन के 
महासिन्धु में 
बहती जलधारा, 
स्नेह और प्रेम की
जो भाषा
तुमसे सीखी है,
ब्याज समेत
समर्पित करना
चाहती हूँ तुम्हें,
तुम्हारे लिए,
तुम्हारी ही 'मैं' !!अनुश्री!!



तमाम बंदिशों के बाद भी मुसलसल कोशिशें जारी रहीं, 
तेरी दीवानगी, हाँ दीवानगी ही सिर पे तारी रही 
फ़क़त तू ही नहीं लिखा था हाथों की लकीरों में, 
वर्ना तो सारी क़ायनात ही हमारी रही !!अनुश्री!!

1 comment:

  1. बहुत खूब ... प्रेम को लिखना ... बहुत मुश्किल ...

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