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Sunday, 20 April 2014

ग़ज़ल

तुम नहीं तो अब तुम्हारी याद का मैं क्या करूँ?
आँख से बहती हुई बरसात का मैं क्या करूँ?

लौट आओ कि तुम्हारा रास्ता तकती हूँ  मैं,
बिन तुम्हारे जगमगाती रात का मैं क्या करूँ?

ग़र उतरना जंग में तो साथ कुछ हिम्मत भी रख,
हौसला दिल में नहीं तो बात का मैं क्या करूँ ?

लोग कहते हैं गया फिर लौट कर आता नहीं,
तेरी यादों में घुले  लम्हात का मैं क्या करूँ?

दिल लगा कर दिल्लगी की काम ये अच्छा न था,
तुम  कहो इस अनछुए जज़्बात का मैं क्या करूँ?!!अनुश्री!!

2 comments:

  1. खूबसूरत गज़ल ... हर शेर दिल से जुड़ा ...

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