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Tuesday, 22 April 2014

कुछ शेर

सागर से मिल के दरिया, इतना ही रह गया,
इक बूँद मेरे इश्क़ का, जो तुझमे घुल गया !!अनुश्री!!

तुझको तेरे ही लिए छोड़ जाना चाहती हूँ, 
सांसों की हर बंदिशें तोड़ जाना चाहती हूँ, !!अनुश्री!!

तुम्हीं को जोहती हैं ये निगाहें, लौट आओ तुम, 
तुम्हारा नाम लेती हैं ये आहें, लौट आओ तुम !!अनुश्री!!

ये न सोचों कि खुशियों में बसर होती है,
कई महलों में भी फांके की सहर होती है !

उसकी आँखों को छलकते हुए आँसूं ही मिले,
वो तो औरत है, कहाँ उसकी कदर होती है,

कहीं मासूम को खाने को निवाला न मिला,
कहीं पकवानों से कुत्तों की गुजर होती है,

वो तो मजलूम था, तारीख पे तारीख मिली,
जहाँ दौलत हो इनायत भी उधर होती है,

दिन गुजरता है काम करते, रात सपनों में,
जिंदगी ग़रीब की ऐसे ही बसर होती है !!अनुश्री!!

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