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Thursday, 13 October 2011

मेरी आँखें

दर्द को..
जज्ब करना नहीं आया,
गहरे इन जख्मो को,
भरना नहीं आया..
थक गयी कोशिश,
करते - करते,
मेरी आँखों को मगर,
हँसना नहीं आया......

मैं तो आज भी...

मेरी आँखों को, तेरा ही इंतज़ार है..
दिल से मुझे, बस इक सदा तो दो,
होश में आने की बात भी न करना,
इस चिंगारी को, थोड़ी और हवा तो दो...
मेरी बाहों को, उनकी गुस्ताखियों की,
उम्र के लिए, कोई सजा तो दो..
खुले जुल्फ, खफा हैं तुमसे,
थोड़े प्यार से इन्हें, मना तो लो..
तुझे छूने की चाह, इधर भी है,
मेरी दुआ कबूल होने की, दुआ तो दो..
'अनु' तो आज भी राज़ी है, तुम्हे मनाने को,
शर्त ये है मुझसे, कभी खफा तो हो..

तुम

तुम्हे भूल कर क्यूँ न जिउ, के तुमने भी तो भूलाया है मुझे,
तन -मन सब झुलसा सा है, इस तरह जलाया है मुझे...

ये प्यार वफ़ा, दिल, दीवानगी, सब किताबी बातें हैं,
इन्ही बातों से तो बरसों, तुम्हे बहलाया है मुझे...

मुझे तबाह करने में, तुमने कोई कमी तो न की,
दिनों दिन, कतरा - कतरा रुलाया है मुझे....

किसी का दीदार, अब सुकून नहीं देता,
इक पत्थर दिल ने ही, पत्थर का बनाया है मुझे....

ये मेरी मुहब्बत का, सिला मिला है मुझे,
के गुजरे कल की तरह, तुमने भुलाया है मुझे...

चाँद

ये चाँद, क्यों हैं?
इतना आकर्षक...
जब भी सामने आता है,
भावनाएं ज्वार भाटा सी
बेकाबू हो जाती हैं...
हसरतें होती हैं,
पूरे उफान पर..
उसे जी भर निहारने की चाह,
दामन में समेटने की चाह..
जैसे आतुर हो लहरें ..
तटबंधों को तोड़ कर,
किनारे से मिल जाने को...

Monday, 3 October 2011

पुरानी dairy

पुरानी डायरी के पन्ने ..
हर पन्ने में खुशबु है,
तुम्हारी यादों की.....

रंगत है,
...उस सूखे फूल की,
जिसे आज भी,
सम्हाल कर रखा है मैंने...

वक़्त बीतता गया,
लम्हे गुजरते रहे,
पलकों पर ख्वाबों के,
सितारे झिलमिलाते रहे.....

'फिर एक दिन'
वो सारे लम्हे,
सारे ख्वाब,
सिमट कर रह गए,
इस पुरानी डायरी के,
नम पन्नो पर..

इंतजार


हमेशा से
'तुम्हारे '
लौटने की राह देखी,
वो चिराग 'जो' जलता छोड़ गए थे तुम..
ये कह कर कि
'इस दिए कि लौ बुझने से पहले मैं लौट आऊंगा'
'मैंने'
उस चिराग कि लौ को कम नहीं होने दिया,
रोज़ उस दिए में तेल डालती रही,
बुझने नहीं दिया 'मैंने', तुम्हारे आस का दिया...
वक्त बीतता गया, लम्हे सालों में बदलने लगे,
सब कुछ तो बदल गया है,
अब 'मैं' ब्याहता हूँ, किसी और की,
'फिर भी' न जाने क्यों,
उस दिए की लौ को बुझने नहीं दिया मैंने,
लेकिन इधर कुछ दिनों से,
'मन' डगमगाने लगा है,
कुछ- कुछ आस भी टूटने लगी है..
और 'अब'
अब, अगर तुम लौट भी आये 'तो क्या'..?

मेरी याद


पता है मुझे,
नहीं याद आती मैं तुम्हे,
तुम्हारी 'स्मृति' में कहीं भी नहीं हूँ मैं,
लेकिन यकीं दिलाती हूँ तुम्हे,
'वो' वक़्त भी आएगा,
'जब तुम' याद करोगे मुझे,
'पुकारोगे',
जोर जोर से आवाज़ दोगे मुझे,
पर 'मैं'.. मैं नहीं आउंगी,
क्यूँ कि 'तब'.. हाँ 'तब'
चिर निंद्रा में लीन हो चुकी होउंगी मैं,
इस ब्रह्माण्ड में विलीन हो चुकी होउंगी मैं... !!अनु!!